चमत्कारिक परिवर्तन का महासंयोग: दुर्गा अष्टमी पर ऐसे करें चंडी हवन, जानें वेदी संस्कार से लेकर पूर्णाहुति तक की पूरी विधि
शक्ति और साधना के महापर्व नवरात्रि की दुर्गा अष्टमी तिथि का सनातन धर्म में अत्यंत अलौकिक और विशिष्ट महत्व माना जाता है। ज्योतिष और तंत्र शास्त्र के जानकारों के अनुसार, अष्टमी की रात्रि और इस पावन दिन पर माता रानी की आराधना व विधि-विधान से किया गया ‘चंडी हवन’ जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन, सुख-समृद्धि और समस्त बाधाओं के नाश का मार्ग प्रशस्त करता है।
यूं तो चंडी हवन किसी भी दिन और किसी भी समय संपन्न किया जा सकता है, परंतु नवरात्रि की दुर्गा अष्टमी पर इसे करने से कई गुना अधिक फल की प्राप्ति होती है। यदि आप भी अपने जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और माता की कृपा का संचार करना चाहते हैं, तो आइए जानते हैं वेदी संस्कार से लेकर आहुतियों तक की संपूर्ण और सटीक हवन विधि:
आरम्भ हवन कुंड का पंचभूत संस्कार से
चंडी हवन किसी भी दिन और समय किया जा सकता है, परंतु नवरात्रि की अष्टमी पर हवन करने से पहले कुंड का पंचभूत संस्कार करना अनिवार्य है।
प्रथम चरण: सर्वप्रथम कुश के अग्रभाग से हवन वेदी को अच्छी तरह साफ करें।
द्वितीय चरण: गोबर और शुद्ध जल आदि से हवन कुंड का लेपन करें।
तृतीय चरण: वेदी के मध्य में बाएं से दक्षिण की ओर उत्तर की तरफ तीन अलग-अलग सीधी रेखाएं खींचें।
चतुर्थ चरण: इन तीनों रेखाओं से यथाक्रम अपनी अनामिका उंगली और अंगूठे से कुछ मिट्टी हवन कुंड से बाहर की तरफ फेंके।
पंचम चरण: दाहिने हाथ से शुद्ध जल को वेदी पर छिड़कें।
अग्नि प्रज्वलन और प्रारंभिक आहुतियां
पंचभूत संस्कार संपन्न करने के बाद हवन कुंड में अग्नि प्रज्वलित करें और अग्निदेव का विधिपूर्वक पूजन करें। इसके पश्चात निम्नलिखित प्रमुख मंत्रों से शुद्ध घी की आहुति दें:
प्रजापति जी के लिए: ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम।
इंद्र देव के लिए: ॐ इन्द्राय स्वाहा। इदं इन्द्राय न मम।
अग्नि देव के लिए: ॐ अग्नये स्वाहा। इदं अग्नये न मम।
सोम देव के लिए: ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय न मम।
व्याहृति आहुतियां:
ॐ भूः स्वाहा। इदं अग्नेय न मम।
ॐ भुवः स्वाहा। इदं वायवे न मम।
ॐ स्वः स्वाहा। इदं सूर्याय न मम।
ब्रह्म और विष्णु जी के लिए:
ॐ ब्रह्मणे स्वाहा। इदं ब्रह्मणे न मम।
ॐ विष्णवे स्वाहा। इदं विष्णवे न मम।
माता लक्ष्मी और मातृकाओं के लिए:
ॐ श्रियै स्वाहा। इदं श्रियै न मम।
ॐ षोडश मातृभ्यो स्वाहा। इदं मातृभ्यः न मम॥
इसके पश्चात नवग्रहों के नाम या उनके मंत्रों से तथा भगवान गणेशजी की आहुति दें।
दुर्गा सप्तशती और नर्वाण मंत्र से हवन
चंडी हवन में दुर्गा सप्तशती के पाठ या ‘नार्वाण मंत्र’ (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै) से जप और आहुति का विशेष विधान है। सप्तशती पाठ के प्रत्येक मंत्र के पश्चात ‘स्वाहा’ का उच्चारण करते हुए हवन में आहुति दें।
सप्तशती पाठ: सप्तशती के प्रत्येक श्लोक या मंत्र के अंत में ‘स्वाहा’ का उच्चारण करते हुए हवन में आहुति प्रदान करें।
नर्वाण मंत्र: माता के मूल मंत्र (नर्वाण मंत्र) से 108 आहुतियां अवश्य दें।
विशेष अध्यायों एवं द्रव्यों से आहुति की विधि
हवन के दौरान विशेष अध्यायों में विशिष्ट सामग्रियों की आहुति देने का विधान है:
सामान्य अध्याय अंत विधि: प्रथम से लेकर अंत तक प्रत्येक अध्याय के समापन पर पुष्प, सुपारी, पान, कमल गट्टा, 2 नग लौंग, 2 नग छोटी इलायची, गूगल, शहद और अंत में 5 बार घी की आहुति दें।
तृतीय अध्याय विशेष: इस अध्याय में “गर्ज-गर्ज क्षणं” श्लोक आने पर शहद से आहुति दें।
आठवां अध्याय विशेष: “मुखेन काली” इस श्लोक पर रक्त चंदन की आहुति अर्पित करें।
ग्यारहवां अध्याय विशेष: पूरे ग्यारहवें अध्याय की आहुति खीर से दें।
सर्वाबाधा निवारण: इसी अध्याय के “सर्वाबाधा प्रशमनम्” मंत्र पर कालीमिर्च की आहुति दें।
हवन पूर्ण होने के बाद आरती करें, क्षमा प्रार्थना मांगें और अंत में माता रानी को भोग लगाकर प्रसाद वितरण करें।

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