पितृ पक्ष 06 : जानिए श्राद्ध / तर्पण में प्रयुक्त होने वाले शब्द के अर्थ, सावधानियाँ संग वर्जित और ग्राह्य खाद्य पदार्थ
” मोक्ष भूमि ” के इस विशेष श्रृंखला में पढ़िए..श्राद्ध / तर्पण में प्रयुक्त होने वाले शब्द के अर्थ का महत्वपूर्ण व प्रामाणिक जानकारी । सम्पूर्ण जानकारी शास्त्रोक्त परंपरा गरुड़ पुराण व धर्मग्रंथों के सिद्धांतों पर yआधारित है। आध्यात्मिक जानकारी के लिए “मोक्षभूमि” सोशल मीडिया के सभी प्लेटफार्म पर है कृपया इनसे जुड़िए
संकलन – डॉ संतोष ओझा | काशी
पितृ पक्ष और श्राद्ध कर्म से जुड़ी शास्त्रीय परंपराओं में कई सूक्ष्म नियमों और शब्दावलियों का विशेष महत्व होता है। यदि आप सही विधि और नियमों का पालन करते हैं, तो पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद सदैव बना रहता है।
श्राद्ध कर्म से जुड़ी मुख्य शब्दावली
अपसव्य: जनेऊ को दाहिने कंधे पर डालकर बाएं हाथ के नीचे करना (पितृ कार्य के लिए विधि)।
सव्य: जनेऊ को सामान्य रूप से बाएं कंधे पर रखना (देव कार्य के लिए विधि)।
एकौद्दिष्ट: केवल एक मृत व्यक्ति (जैसे पिता) के निमित्त किया जाने वाला विश्वेदेव-रहित श्राद्ध।
कव्य: पितरों को अर्पित किया जाने वाला द्रव्य या भोजन।
तर्पण: जल, तिल, कुशा आदि से पितरों, ऋषियों और देवताओं को जल अर्पित करने की क्रिया।
दोहित्र: पुत्री का पुत्र,
पवित्री: कुशा (घास) से बनी अंगूठी जिसे तर्पण के समय अनामिका उंगली में पहना जाता है।
महालय: भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक का 16 दिनों का श्राद्ध पक्ष।
सपिंड व सोदक: स्वयं से 7 पीढ़ी तक के पूर्वज ‘सपिंड’, 8 से 14 पीढ़ी तक ‘सोदक’ तथा 15 से 21 पीढ़ी तक ‘सगोत्र’ कहलाते हैं।
उदक : पूजा के लिए जल प्रदान करना
आलोड़न= जल को घुमाना
नारायण बलि= दुर्गति से बचने के लिए किया जाने वाला प्रायश्चित स्वरूप अनुष्ठान
पवित्री : कुश द्वारा बनाई गई अंगूठी जो अनामिका उंगली में पहनी जाती है|
अमन्न : अर्थात कच्चा अन्न
मार्जन: जल का छिटा देकर किसी चीज को पवित्र करना|
अपसव्य : जनेऊ को बाएं कंधे पर डालना दाने हाथ के नीचे करना है इसके विपरीत अपसव्य विधि कहलाती है अर्थात जनेऊ को दाहिने कंधे पर डालकर बाए हाथ के नीचे करना
पितृ पूजन की सावधानियाँ, वर्जित खान-पान एवं स्थल
• पितृ पूजा में जनेऊ अपसव्य (दाहिने कंधे पर) रखें।
• पितरों को चंदन तर्जनी उंगली से लगाएं (अनामिका केवल देवताओं के लिए है)।
• भोजन सर्व करने के लिए मिटटी, लकड़ी या पत्तों के दोने का प्रयोग करें (केले का पत्ता वर्जित)
वर्जित खाद्य पदार्थ
बैंगन, गाजर, मसूर, अरहर, गोल लौकी, शलजम, हींग, प्याज, लहसुन, काला नमक, काला जीरा, चना, सरसों, कांजी, कचनार, जामुन, सुपारी, लोहे के बर्तन में बना भोजन पूरी तरह निषिद्ध है।
ग्राह्य खाद्य पदार्थ
गेहूं, ज्वॉर, जौ, उड़द, चावल, आम, ईख, शहद, शक्कर, सत्तू, सिंघाड़ा, केसर, तिल, गंगाजल।
पवित्र श्राद्ध स्थल
गंगा तट, प्रयागराज, अमरकंटक, बदरीनाथ, गया जी।
( इनके अभाव में किसी भी शुद्ध जल स्थान के पास श्राद्ध कर्म किया जा सकता है )
तर्पण विधि, महामंत्र एवं पितृ दोष निवारण उपाय
तर्पण की शास्त्रोक्त विधि
दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें।
दाहिने हाथ की अनामिका में दो कुशा की पवित्री और बाएं में तीन कुशा की पवित्री पहनें।
हाथों में कुशा, जौ, काले तिल, जल और शहद लेकर तर्जनी व अंगूठे के मध्य स्थान (पितृ तीर्थ) से जल अर्पित करें।
वंश वृद्धि हेतु: पिंड दान के पश्चात संतान की अभिलाषा रखने वाले दंपत्ति बीच वाले पिंड का आचमन/ग्रहण कर पितरों से कुलोन्नति की प्रार्थना करें।
मुख्य जपनीय मंत्र
१. पितृ प्रार्थना मंत्र:
ॐ क्रीं क्लीं ऐं सर्वपितृभ्यो स्वात्मा सिद्धये ॐ फट्।
२. पितृ प्रसन्नता मंत्र:
ॐ सर्व पितृ प्रं प्रसन्नो भव ॐ।
३. पितृ दोष बाधा शमन मंत्र:
ॐ श्रीं सर्व पितृदोष निवारण क्लेश हन् हन् सुख शांति देहि फट् स्वाहा।
गृह सुख-शांति एवं पितृ दोष शमन प्रयोग
नित्य तर्पण के पश्चात दूध से बने प्रसाद का भोग लगाएं और मंत्र जप के बाद उसे पश्चिम दिशा की ओर फेंक दें। यह प्रयोग लगातार 11 दिनों तक करें। 12वें दिन उस मिट्टी के पात्र को जल में विसर्जित कर दें तथा एक नारियल अपने पूजा स्थान पर स्थापित करें। इस प्रयोग से पितृ दोष का निवारण होता है तथा घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
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