Naam Jap – प्रेमानंद जी महाराज से के एन राव तक: आखिर क्यों आज की पीढ़ी के बीच ‘नाम जप’ बन रहा है महामंत्र?
– सिर्फ शब्दों का दोहराव नहीं, श्वास का विज्ञान है ‘नाम जप’: जानें कैसे जागृत होती है सोई हुई ऊर्जा
आज के भागदौड़ भरे युग में जहां मानसिक शांति एक दुर्लभ वस्तु बन गई है, वहीं ‘नाम जप’ का बढ़ता चलन नई आशा की किरण बनकर उभरा है। सोशल मीडिया पर प्रेमानन्द जी महाराज जैसे संतों के वीडियो ने युवाओं को इस प्राचीन पद्धति की ओर आकर्षित किया है। लेकिन क्या नाम जप केवल शब्दों का दोहराव है? जानकारों और शास्त्रों की मानें तो यह श्वास, एकाग्रता और संकल्प का एक गहरा विज्ञान है।
गुरु दीक्षा और पात्रता का प्रश्न
सनातन परंपरा में गुरु-शिष्य परंपरा का विशेष महत्व है। अक्सर यह कहा जाता है कि बिना गुरु दीक्षा के मंत्र जप निष्फल होता है, लेकिन इतिहास इसके उलट उदाहरणों से भी भरा है। डाकू रत्नाकर ने बिना किसी औपचारिक दीक्षा के ‘मरा-मरा’ जपकर भी ‘राम’ को प्राप्त किया और महर्षि वाल्मीकि बने।
विशेषज्ञों के अनुसार, नाम जप के लिए सबसे महत्वपूर्ण ‘पात्रता’ है। साधक का मन, वचन और कर्म से शुद्ध होना अनिवार्य है। सात्विक आहार, संयमित वाणी और नैतिक आचरण इसके आधार स्तंभ हैं।
श्वास और जप का समन्वय: के एन राव का अनुभव
प्रख्यात ज्योतिषी के एन राव ने अपनी पुस्तक ‘योगी, प्रारब्ध एवं कालचक्र’ में अपने गुरु स्वामी परमानंद सरस्वती द्वारा दिए गए गूढ़ निर्देशों को साझा किया है। उन्होंने नाम जप को श्वास के साथ जोड़ने की एक विशेष विधि बताई है:
लयबद्ध श्वसन: चलते-फिरते या लेटे हुए गहरी श्वास लें और छोड़ें। श्वास के अंदर जाने और बाहर आने के साथ निरंतर जप करें।
भ्रूमध्य ध्यान: बिस्तर पर सीधे लेटकर, बिना तकिया लगाए अपनी आंखों को बंद करें और दोनों भौहों के बीच (आज्ञा चक्र) ध्यान केंद्रित कर 40 मिनट तक जप करें।
शून्यता का अनुभव: जप के बाद जब श्वास स्वाभाविक और अत्यंत धीमी हो जाए, तो उस शांति का आनंद लें। यह स्थिति मस्तिष्क में ‘शून्यता’ पैदा करती है, जो गहरी आध्यात्मिक प्रगति का लक्षण है।
कुंडलिनी जागरण: ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन
इस अभ्यास का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव ऊर्जा का संचरण है। निरंतर अभ्यास से रीढ़ की हड्डी के मध्य भाग (सुषुम्ना नाड़ी) में ऊर्जा की तरंगें ऊपर की ओर उठने लगती हैं। यह कुंडलिनी जागरण का संकेत है।
“ध्यानं जपज्योतिषम्… सब प्रकार के यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ।”
— भगवान श्री कृष्ण (गीता, अध्याय 10)
सिख गुरु तेग बहादुर ने भी कहा है, ‘श्वास श्वास सुमिरो गोविंद’। यानी हर सांस के साथ परमात्मा का नाम जुड़ा होना चाहिए।
चेतना के सात सोपान
नाम जप के माध्यम से साधक चेतना के उच्च स्तर तक पहुँच सकता है। इसके लिए सात चक्रों का भेदन आवश्यक है:
मूलाधार 2. स्वाधिष्ठान 3. मणिपुर 4. अनाहत 5. विशुद्धि 6. आज्ञा 7. सहस्रार।
यह यात्रा एक दिन की नहीं, बल्कि कई जन्मों के प्रारब्ध, गुरु की कृपा और निरंतर साधना का परिणाम होती है। यदि इसे जीवनपर्यन्त की आदत बना लिया जाए, तो व्यक्ति साधारण से असाधारण व्यक्तित्व में परिवर्तित हो सकता है।
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डिस्क्लेमर : सभी जानकारियाँ सनातन धार्मिक ग्रंथों, विद्वानों की सलाह और मान्यताओं पर आधारित है। तथ्यों की सटीकता पर संशय के स्थिति पर अपने पुरोहित से सलाह लें ।


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