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त्रिपिंडी श्राद्ध 2 : क्या आपके बनते काम भी बिगड़ रहे हैं? जानें पितृदोष के लक्षण और क्यों ‘त्रिपिंडी श्राद्ध’ है इसका अचूक समाधान

– डॉ संतोष वोजा, काशी, विशेष डेस्क

“मोक्ष भूमि काशी” के विशेष श्रृंखला “त्रिपिंडी श्राद्ध” के 9 अंक के इस श्रृंखला का दूसरा भाग

​सनातन धर्म में पितरों का स्थान देवताओं के समान पूजनीय माना गया है। देव कृपा से भी पहले पितृ कृपा को अनिवार्य माना गया है, क्योंकि पितरों के असंतुष्ट होने पर जीवन में कई तरह की परेशानियां खड़ी हो जाती हैं। धार्मिक नगरी काशी (वाराणसी) में पितरों की मुक्ति के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों का विशेष महत्व है।

​”मोक्ष भूमि काशी” की इस विशेष श्रृंखला के भाग – 2 में आज हम बात करेंगे कि आप कैसे पहचानें कि आप पितृदोष से ग्रसित हैं, इसका आपके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है, और आखिर क्यों इसके निवारण के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध को सर्वोत्तम माना गया है।

​कैसे जानें कि आप पितृदोष से ग्रसित हैं? (पितृदोष के मुख्य लक्षण)

​यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य या राहू-केतु का खराब योग हो, या पूर्वजों का विधिवत तर्पण न हुआ हो, तो पितृदोष उत्पन्न होता है। इसके लक्षण आपके दैनिक जीवन में साफ दिखाई देने लगते हैं:

​वंश वृद्धि में रुकावट: लाख कोशिशों के बाद भी संतान प्राप्ति न होना, बार-बार गर्भपात होना या संतान का स्वास्थ्य हमेशा खराब रहना पितृदोष का सबसे बड़ा लक्षण माना जाता है।
​विवाह में अत्यधिक देरी: घर के योग्य युवक-युवतियों के विवाह में बिना किसी ठोस कारण के लगातार रुकावटें आना या तय होकर रिश्ता टूट जाना।
​गृह क्लेश और अशांति: परिवार में बिना बात के रोज लड़ाई-झगड़े होना, प्रेम का अभाव और हर समय तनाव का माहौल बने रहना।
​आर्थिक तंगी और व्यापार में घाटा: कड़ी मेहनत के बाद भी धन की कमी रहना, कर्ज का लगातार बढ़ना और बनते हुए कामों का ऐन वक्त पर बिगड़ जाना।
​अचानक गंभीर बीमारियां: परिवार में किसी न किसी सदस्य का हमेशा बीमार रहना, जिसका इलाज कराने पर भी डॉक्टरों को बीमारी समझ न आए।
​सपनों में पूर्वजों का आना: सपने में बार-बार पितरों का रोते हुए, बीमार या कष्ट में दिखाई देना, या फिर सांपों के सपने आना।

​आपके जीवन को कैसे प्रभावित करता है पितृ दोष?

​पितृ दोष केवल एक धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि यह व्यक्ति के पूरे जीवन चक्र को अस्त-व्यस्त कर देता है।

​प्रभाव: यह दोष व्यक्ति के भाग्य को अवरुद्ध कर देता है। जिस प्रकार एक सूखे पेड़ की जड़ में पानी देने से पूरा पेड़ हरा-भरा हो जाता है, उसी प्रकार पितरों के असंतुष्ट रहने से जीवन रूपी वृक्ष सूखने लगता है। व्यक्ति मानसिक अवसाद (Depression) का शिकार हो जाता है, उसकी सकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है और समाज में उसका मान-सम्मान घटने लगता है।

​आखिर क्यों करना चाहिए ‘त्रिपिंडी श्राद्ध’?
​जब साधारण श्राद्ध या तर्पण से पितरों की तृप्ति नहीं होती, तब त्रिपिंडी श्राद्ध करने का विधान है। यह एक विशेष काम्य श्राद्ध है, जो पितृदोष की शांति के लिए अचूक माना गया है।

​त्रिपिंडी श्राद्ध का महत्व और विज्ञान:
​पितर मुख्य रूप से तीन प्रकार की योनियों (रुद्र, आदित्य और वसु) में होते हैं। यदि परिवार में पिछले तीन पीढ़ियों में किसी की अकाल मृत्यु हुई हो, या कोई कुंवारा मरा हो, या किसी का अंतिम संस्कार ठीक से न हुआ हो, तो वे प्रेत योनि में भटकते रहते हैं।

​त्रिपिंडी श्राद्ध में तीन देवताओं को साक्षी मानकर तीन अलग-अलग पिंड दिए जाते हैं:

पिंड का प्रकार, संबंधित देवता और किसके लिए?

जौ का पिंड,
भगवान सात्विक (विष्णु)सात्विक
आत्माओं की तृप्ति के लिए

चावल का पिंड
भगवान राजस (ब्रह्मा)
राजसी प्रवृत्तियों वाली आत्माओं के लिए

तिल का पिंड
भगवान तामस (शिव)
प्रेत

काशी में त्रिपिंडी श्राद्ध क्यों है खास?

​मोक्ष की नगरी काशी में त्रिपिंडी श्राद्ध करने से भटकती हुई आत्माओं को प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है और वे पितृ लोक में स्थान प्राप्त करती हैं। इसे करने से पितर प्रसन्न होकर वंशजों को सुख, समृद्धि, दीर्घायु और संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देते हैं।

​यदि आप भी उपरोक्त लक्षणों से परेशान हैं, तो किसी विद्वान तीर्थ पुरोहित से अपनी कुंडली दिखाकर या लक्षणों के आधार पर काशी, गया या त्र्यंबकेश्वर में त्रिपिंडी श्राद्ध अवश्य करवाएं।

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Author: Admin Editor MBC

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