अक्षय तृतीया विशेष: क्यों भगवान परशुराम ने किया था अपनी माता का वध? जानें अहंकार और न्याय की यह अद्भुत कथा
धर्म डेस्क | अक्षय तृतीया का पावन पर्व भगवान विष्णु के छठे अवतार, भगवान परशुराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर क्षत्रियों सा पराक्रम रखने वाले परशुराम जी का जीवन न्याय, साहस और अनुशासन का प्रतीक है। लेकिन उनके जीवन की एक ऐसी घटना भी है जो आज भी जनमानस को हैरत में डाल देती है— अपनी ही माता का वध। आखिर एक आज्ञाकारी पुत्र ने ऐसा कठोर कदम क्यों उठाया? इसके पीछे की कहानी राजा के अहंकार और पिता की आज्ञा से जुड़ी है।
अहंकार की उपज: दो बहनों की अलग तकदीर
त्रेतायुग के महान सम्राट मंधाता के पौत्र राजा प्रसेनजित की दो अत्यंत रूपवती कन्याएं थीं— रेणुका और बेणुका। राजा को अपने वैभव और सत्ता पर बहुत अहंकार था। एक दिन उन्होंने अपनी पुत्रियों से पूछा, “तुम किसका दिया खाती हो?”
बेणुका का उत्तर: उसने पिता को खुश करने के लिए कहा, “पिताजी, मैं आपका दिया खाती हूँ।” राजा इससे बहुत प्रसन्न हुए।
रेणुका का उत्तर: सत्य और धर्म में विश्वास रखने वाली रेणुका ने विनम्रता से कहा, “पिताजी, हम सब उस परमात्मा का दिया खाते हैं।”
पुत्री के इस उत्तर से राजा के अहंकार को गहरी चोट लगी। प्रतिकार (बदला) लेने के उद्देश्य से राजा ने बेणुका का विवाह उस समय के सबसे प्रतापी सम्राट सहस्रबाहु अर्जुन से कर दिया, जबकि रेणुका का विवाह एक निर्धन तपस्वी भृगुवंशीय ऋषि जमदग्नि के साथ कर दिया।
भगवान परशुराम का जन्म और व्यक्तित्व
इसी तपस्वी जोड़े (ऋषि जमदग्नि और रेणुका) के घर वैशाख शुक्ल तृतीया को महापराक्रमी राम का जन्म हुआ। वे अपने भाइयों—रुमण्वान, सुषेण, वसु और विश्वावसु—में सबसे छोटे थे।
खास बात: ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बावजूद उनके संस्कार क्षत्रियों जैसे थे। वे सदा अपने हाथ में एक ‘परशु’ (फरसा) धारण किए रहते थे, जिस कारण वे ‘राम’ से परशुराम कहलाए।
पिता की आज्ञा और माता का वध: रहस्यमयी घटना
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार माता रेणुका जल लेने नदी पर गईं, जहाँ गंधर्वराज चित्ररथ को देखकर वे कुछ क्षणों के लिए मोहवश उनकी सुंदरता निहारने लगीं। जब वे आश्रम लौटीं, तो ऋषि जमदग्नि ने अपनी योगशक्ति से यह जान लिया। क्रोधवश उन्होंने अपने पुत्रों को माता का वध करने की आज्ञा दी।
भाइयों का इनकार: बड़े चारों पुत्रों ने अपनी माता का वध करने से मना कर दिया, जिसके कारण ऋषि ने उन्हें विचारशून्य होने का श्राप दे दिया।
परशुराम का निर्णय: जब परशुराम की बारी आई, तो उन्होंने बिना विलंब किए पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी माता का वध कर दिया।
क्यों उठाया यह कदम?
परशुराम जी जानते थे कि पिता की आज्ञा न मानने पर वे भी श्राप के भागी बनेंगे और पिता के क्रोध को शांत करना आवश्यक है। उनकी पितृभक्ति देखकर ऋषि जमदग्नि प्रसन्न हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा।
परशुराम ने चतुरता और भक्ति दिखाते हुए तीन वरदान माँगे:
पहला: उनकी माता पुनः जीवित हो जाएं।
दूसरा: उन्हें इस वध की स्मृति (याद) न रहे।
तीसरा: उनके चारों भाई पुनः चेतना प्राप्त करें।
ऋषि ने ‘तथास्तु’ कहा और इस प्रकार परशुराम ने पिता की आज्ञा भी पूरी की और अपनी माता को सदेह वापस भी पा लिया।
भगवान परशुराम का जीवन हमें सिखाता है कि विषम परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य और विवेक का संतुलन कैसे बनाया जाता है। आज उनकी जयंती पर हम उस महान तेजपुंज को नमन करते हैं।
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