Pradosh Vrat : जानिए क्या हैं प्रदोष व्रत, महत्व, व्रत और पूजा विधि इसका फल प्राप्ति साथ ही कथा
हिंदू धर्म में भगवान शिव की कृपा पाने के लिए प्रदोष व्रत को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यह व्रत न केवल कष्टों को हरने वाला है, बल्कि साधक के जीवन में सुख और समृद्धि का संचार भी करता है।
क्या है प्रदोष व्रत और इसका महत्व?
प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि (शुक्ल और कृष्ण पक्ष दोनों) को प्रदोष व्रत रखा जाता है। सूर्यास्त के बाद और रात्रि के आगमन से पहले का समय ‘प्रदोष काल’ कहलाता है। मान्यता है कि इस समय महादेव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएं शीघ्र सुनते हैं।
यह व्रत व्यक्ति के पापों का नाश करता है और उसे जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करने की शक्ति रखता है। अलग-अलग दिनों में पड़ने वाले प्रदोष का अलग फल होता है।
धर्म ग्रंथों में उल्लेख
प्रदोष व्रत की महिमा का मुख्य वर्णन ‘स्कंद पुराण’ में विस्तार से मिलता है। इसके अतिरिक्त ‘शिव पुराण’ में भी प्रदोष काल की पूजा को अत्यंत कल्याणकारी बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति निष्काम भाव से यह व्रत करता है, उसे दो गायों के दान के समान पुण्य प्राप्त होता है।
व्रत का विधि-विधान
प्रदोष व्रत की पूजा के कुछ विशेष नियम और चरण होते हैं:
संकल्प: सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। पूरे दिन निराहार (या फलाहार) रहें।
स्नान और तैयारी: शाम को सूर्यास्त से करीब 45 मिनट पहले दोबारा स्नान करें और श्वेत वस्त्र पहनें।
पूजा की दिशा: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
अभिषेक: शिवलिंग पर गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर (पंचामृत) से अभिषेक करें।
अर्पण: शिव जी को बेलपत्र, धतूरा, भांग, अक्षत और सफेद फूल अर्पित करें।
प्रदोष काल पूजा: प्रदोष काल में ही मुख्य पूजा और आरती की जाती है। इस समय शिव चालीसा या “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें।
प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा
प्रदोष व्रत से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से एक मुख्य कथा एक गरीब ब्राह्मण विधवा की है:
प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ भिक्षा मांगकर जीवन यापन करती थी। एक दिन उसे विदर्भ देश का राजकुमार मिला, जिसे शत्रुओं ने राज्य से निकाल दिया था। ब्राह्मणी ने उसे अपने पास रख लिया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी ने प्रदोष व्रत किया और ऋषि शाण्डिल्य के पास जाकर विधान पूछा।
व्रत के प्रभाव से एक दिन राजकुमार को गंधर्व कन्या ‘अंशुमती’ मिली और उनका विवाह हो गया। राजकुमार ने बाद में अपनी सेना तैयार की और विदर्भ का अपना खोया हुआ राज्य वापस प्राप्त किया। उसने उस ब्राह्मणी के पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया। तब से यह मान्यता पुख्ता हो गई कि प्रदोष व्रत करने से दरिद्रता दूर होती है और सुख-राजयोग की प्राप्ति होती है।
वार के अनुसार प्रदोष का फल
सोमवार – सोम प्रदोष शांति और आरोग्य की प्राप्ति
मंगलवार – भौम प्रदोष ऋण (कर्ज) से मुक्ति
बुधवार- बुध प्रदोष बुद्धि और ज्ञान का विकास
गुरुवार – गुरु प्रदोष शत्रुओं पर विजय और पितरों का आशीर्वाद
शुक्रवार – भृगु प्रदोष सौभाग्य और दांपत्य सुख
शनिवार – शनि प्रदोष संतान सुख और नौकरी में उन्नति
रविवार – रवि प्रदोष मान-सम्मान और लंबी आयु
व्रतकर्ता के लिए विशेष
व्रतकर्ता को दिन में शयन नहीं करना चाहिए। अपनी दिनचर्या को नियमित संयमित रखनी चाहिए, ब्रह्मचर्य के नियम का पालन करना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को उपयोगी वस्तुओं का दान करना चाहिए, साथ ही गरीबों व असहायों की सेवा व सहायता करनी चाहिए।
ऐसे करें व्रत व पूजा
– प्रदोष व्रत के दिन सुबह स्नान करने के बाद भगवान शंकर, पार्वती और नंदी को पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराएं।
– इसके बाद बेल पत्र, गंध, चावल, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य (भोग), फल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची भगवान को चढ़ाएं।
– पूरे दिन निराहार (संभव न हो तो एक समय फलाहार) कर सकते हैं) रहें और शाम को दुबारा इसी तरह से शिव परिवार की पूजा करें।
– भगवान शिवजी को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाएं। आठ दीपक आठ दिशाओं में जलाएं।
– भगवान शिवजी की आरती करें। भगवान को प्रसाद चढ़ाएं और उसीसे अपना व्रत भी तोड़ें।उस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें।
ये उपाय भी करें
सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद तांबे के लोटे से सूर्यदेव को अर्ध्य देें। पानी में आकड़े के फूल जरूर मिलाएं। आंकड़े के फूल भगवान शिवजी को विशेष प्रिय हैं । ये उपाय करने से सूर्यदेव सहित भगवान शिवजी की कृपा भी बनी रहती है और भाग्योदय भी हो सकता है।
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डिस्क्लेमर : सभी जानकारियाँ सनातन धार्मिक ग्रंथों, विद्वानों की सलाह और मान्यताओं पर आधारित है। तथ्यों की सटीकता पर संशय के स्थिति पर अपने पुरोहित से सलाह लें ।


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