Home 2026 त्रिपिंडी श्राद्ध 3 : जानिए “त्रिपिंडी श्राद्ध” के नियम, क्या करें और क्या न करें…से जुड़ी स

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त्रिपिंडी श्राद्ध 3 : जानिए “त्रिपिंडी श्राद्ध” के नियम, क्या करें और क्या न करें…से जुड़ी समस्त जानकारी

– डॉ संतोष वोजा, काशी, विशेष डेस्क

“मोक्ष भूमि काशी” के विशेष श्रृंखला “त्रिपिंडी श्राद्ध” के 9 अंक के इस श्रृंखला का तीसरी अंक में जानिए त्रिपिंडी श्राद्ध के नियम, क्या करें और क्या न करें…से जुड़ी समस्त जानकारी

त्रिपिंडी श्राद्ध हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशेष पूजन माना जाता है। यह मुख्य रूप से उन पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए किया जाता है जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो, या जिनकी वार्षिक श्राद्ध क्रियाएं किसी कारणवश छूट गई हों, जिसके कारण परिवार को ‘पितृदोष’ का सामना करना पड़ रहा हो।

​यह केवल एक सामान्य पूजा नहीं है, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक शुद्धि की प्रक्रिया है। इसलिए, त्रिपिंडी श्राद्ध करने से पूर्व और दौरान कई कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है ताकि पूजा का पूर्ण फल मिल सके।

​नीचे इसके नियम, क्या करें और क्या न करें, इसकी विस्तृत जानकारी दी गई है:

​1. त्रिपिंडी श्राद्ध से पूर्व (पहले) ध्यान रखने योग्य बातें
​पूजा शुरू होने से कुछ दिन पहले से ही शारीरिक और मानसिक पवित्रता की तैयारी शुरू हो जाती है।

​क्या करना चाहिए?

​सही स्थान, तिथि और समय का चयन: त्रिपिंडी श्राद्ध मुख्य रूप से पवित्र तीर्थस्थलों पिचासमोचन (काशी ), त्र्यंबकेश्वर (नासिक) और गया जी में ही कराना सबसे उत्तम माना जाता है। इसके लिए किसी योग्य और विद्वान ब्राह्मण से शुभ मुहूर्त अवश्य निकलवाएं।

​ब्रह्मचर्य का पालन: पूजा के कम से कम 3 दिन पूर्व से ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करना अनिवार्य है।

​सात्विक भोजन: अनुष्ठान से 2-3 दिन पहले से ही घर में पूरी तरह सात्विक भोजन बनना चाहिए। भोजन में लहसुन, प्याज और भारी मसालों का त्याग करें।

​क्षमा प्रार्थना: पूजा पर निकलने से पहले अपने घर के मंदिर में पूर्वजों का स्मरण कर उनसे अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगें और अनुष्ठान की सफलता की कामना करें।

​क्या नहीं करना चाहिए?

​व्यसनों से दूरी: पूजा के पूर्व मांस, मदिरा, तंबाकू या किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन भूलकर भी न करें। ऐसा करने पर पूजा निष्फल हो जाती है।

​बाल और नाखून काटना: यदि आप मुख्य कर्ता (पूजा पर बैठने वाले) हैं, तो पूजा से कम से कम 2-3 दिन पहले से बाल, दाढ़ी या नाखून न काटें। यह कार्य पूजा स्थल पर पहुंचकर नियमानुसार ही करें।

स्नान कर श्वेत वस्त्र धारण करिए और स्नान किए हुए बस को वहीं छोड़ दें।

​क्रोध और विवाद: मन में किसी के प्रति द्वेष, क्रोध या घर में कलह न करें। शांत और पवित्र मन से यात्रा की शुरुआत करें।
​2. त्रिपिंडी श्राद्ध के दरमियान (पूजा के दौरान) के नियम
​जब आप पूजा स्थान पर बैठते हैं, तो उस समय आपकी मानसिक स्थिति और क्रियाएं बेहद मायने रखती हैं।

​क्या करना चाहिए?

​शास्त्रोक्त विधि का पालन: पूजा में तीन प्रकार के कलश /पिंड (ताम्र, रजत और स्वर्ण या फिर चावल, जौ और काले तिल के आटे से बने पिंड) तीन प्रकार के पितरों (प्रेत, अंतरिक्ष और भूमिगत) के लिए दिए जाते हैं। पंडित जी के हर निर्देश का पूरी श्रद्धा से पालन करें।

​वस्त्रों का चयन: पूजा के दौरान पुरुष कर्ता को सफेद धोती और सोला (अंगवस्त्र) धारण करना चाहिए। महिलाएं यदि साथ बैठ रही हैं, तो उन्हें पीले, सफेद या हल्के रंग की सूती साड़ी पहननी चाहिए।

​पूर्ण एकाग्रता और मंत्रोच्चार: पूजा के दौरान अपना ध्यान पूरी तरह पितरों की शांति पर केंद्रित रखें। संकल्प के मंत्रों का स्पष्ट उच्चारण ( दोहराये ) करें या अति विकट स्थिति में हो तो पंडित जी द्वारा बोले जा रहे मंत्रों को ध्यान से सुनें।

अनुष्ठान की शुरुआत पूर्व से तथा समाप्ति दक्षिण दिशा से होती है लिहाजा आसन पर बैठने पूर्व अपनी सुविधा का ध्यान रखें।
​दान-दक्षिणा और संकल्प: त्रिपिंडी श्राद्ध के अंत में अपनी क्षमता के अनुसार अन्नदान, वस्त्रदान और ब्राह्मणों को दक्षिणा अवश्य दें।

​क्या नहीं करना चाहिए?

​काले और चमकीले वस्त्रों की मनाही: पूजा के दौरान भूलकर भी काले, नीले या अत्यधिक भड़कीले (चमकीले) रंग के कपड़े न पहनें।

​चमड़े की वस्तुओं का निषेध: पूजा पंडाल या वेदी के पास चमड़े की बेल्ट, पर्स या जूते-चप्पल लेकर न जाएं।

​लोहे के बर्तनों का उपयोग: श्राद्ध कर्म में लोहे या स्टील के बर्तनों का उपयोग वर्जित माना गया है। पूजा में केवल तांबे, पीतल या चांदी के बर्तनों का ही उपयोग होना चाहिए।

​जल्दबाजी या चिड़चिड़ापन: पूजा लंबी चल सकती है ( 3 घंटे), इसलिए धैर्य रखें। किसी भी स्थिति में अपने आसन से बीच में न उठे , फोन चलाना या चिड़चिड़ाना पूरी अनुष्ठान को दूषित कर सकता है।

​3. पूजा के तुरंत बाद क्या करें?

​पूजा संपन्न होने के बाद वहां गाय, कौए और कुत्ते के लिए भोजन (काकबली) अवश्य निकालें।

अपने पितरों की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें साथ ही उनसे जाने अनजाने में हुए गलतियों के लिए क्षमा याचना भी करें।
​घर लौटने पर सीधे मुख्य द्वार से प्रवेश करने से पहले हाथ-पैर धोएं और फिर घर के मंदिर में दीप जलाएं।

“मोक्ष भूमि निवेदन” :
त्रिपिंडी श्राद्ध हमेशा सपरिवार या कम से कम पति-पत्नी को साथ मिलकर करना चाहिए। यदि व्यक्ति अविवाहित है, तो वह अकेले भी इसे कर सकता है। महिलाओं को पीरियड्स (मासिक धर्म) के दौरान इस पूजा में बैठने की अनुमति नहीं होती।


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Author: Admin Editor MBC

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