पितृपक्ष विशेष 08 : जन्म या मृत्यु के अशौच में पिंडदान-तर्पण सही या गलत? शास्त्रों के प्रमाण संग समझें पूरा विधान
” मोक्ष भूमि ” के इस विशेष श्रृंखला में पढ़िए..सूतक के दौरान तर्पण पिंडदान और ब्राम्हण भोजन पर धर्म ग्रंथो में नियमो की अत्यंत महत्वपूर्ण व प्रामाणिक जानकारी । सम्पूर्ण जानकारी शास्त्रोक्त परंपरा गरुड़ पुराण व धर्मग्रंथों के सिद्धांतों पर yआधारित है। आध्यात्मिक जानकारी के लिए “मोक्षभूमि” सोशल मीडिया के सभी प्लेटफार्म पर है कृपया इनसे जुड़िए
संकलन – डॉ संतोष ओझा | काशी
– सूतक में श्राद्ध करना पड़ेगा भारी! जानें अशौच समाप्त होने के बाद कैसे करें पितरों को तृप्त
सनातन परंपरा में सूतकम (मरणाशौच) और पातक/जननाशौच (जन्माशौच) के समय व्यक्ति मंत्रोच्चार, पिंडदान, तर्पण और देव/पितृ पूजन के लिए अयोग्य (अशुद्ध) माना जाता है।
अशौच काल में श्राद्ध व तर्पण का निषेध
धर्मशास्त्रीय ग्रंथ ‘धर्मसिंधु’ और ‘निर्णयसिंधु’ में अशौच (सूतक/पातक) के दौरान मंत्रपूर्वक श्राद्ध एवं तर्पण का स्पष्ट निषेध किया गया है:
श्लोक:
अशौचे तु न कर्तव्यं श्राद्धं तर्पणमेव च।
मंत्राणां न जपश्चैव देवतानां च पूजनम्॥
(धर्मसिंधु / निर्णयसिंधु – अशौच निर्णय)
अर्थ: अशौच (सूतक और पातक) की स्थिति में श्राद्ध, जल से तर्पण, वेदमंत्रों का पाठ-जप और देवताओं का पूजन कदापि नहीं करना चाहिए।
सूतक में दान व ब्राह्मण भोजन का निषेध
‘गरुड़ पुराण’ (प्रेतकल्प) में सूतक काल के दौरान पके हुए अन्नदान और ब्राह्मण-भोजन का निषेध करते हुए कहा गया है:
श्लोक:
अशौचे तु यद्दास्यति दानं वा ब्राह्मणाय च।
न च तत्पितृभिः भुक्तं न च देवैः परिगृहीतम्॥
(गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प)
अर्थ: अशौच काल में यदि कोई मनुष्य ब्राह्मण को भोजन कराता है या दान देता है, तो उसे न तो देवगण स्वीकार करते हैं और न ही वह पितरों को प्राप्त होता है। वह निष्फल हो जाता है।
अशौच समाप्त होने के बाद का शास्त्रीय विधान
सूतक या पातक समाप्त होने के उपरांत छूटे हुए श्राद्ध-तर्पण को संपन्न करने के लिए शास्त्रों में समय-सारणी निर्धारित है:
यदि अशौच पितृपक्ष के दौरान ही समाप्त हो जाए:
शुद्धि स्नान व क्षौर कर्म (मुंडन आदि) के बाद पितृपक्ष की बची हुई तिथियों में अथवा सर्वपितृ अमावस्या के दिन सभी छूटे हुए पूर्वजों के लिए संकल्प लेकर पिंड-तर्पण संपन्न किया जा सकता है।
यदि अशौच पूरे पितृपक्ष के बाद समाप्त हो:
‘निर्णयसिंधु’ के अनुसार यदि सूतक या पातक पूरे पितृपक्ष में बना रहे और अमावस्या के बाद समाप्त हो, तो आगामी कार्तिक अमावस्या (अथवा आगामी पक्ष की अमावस्या) को वह श्राद्ध-पिंडदान संपन्न कर लेना चाहिए।
अशौच के दौरान केवल मानसिक स्मरण का विधान:
अशौच काल में मंत्रोच्चार, तिल-जल अर्पण और पिंड देना वर्जित है, परंतु चित्त से पूर्वजों का ध्यान किया जा सकता है। उस समय मन ही मन
“ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥”
का मानसिक स्मरण किया जा सकता है।
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