Shardiiya Navratra: जानिये किसने शुरू किया नवरात्रि व्रत, इतिहास, महत्त्व तथा शास्त्र !
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।अर्थ: समस्त प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी कल्याण करने वाली, सब के मनोरथ को पूरा करने वाली, तुम्हीं शरण ग्रहण करने योग्य हो, तीन नेत्रों वाली यानी भूत, भविष्य और वर्तमान को प्रत्यक्ष देखने वाली हो, तुम्ही शिव पत्नी, तुम्ही नारायणी अर्थात भगवान के सभी स्वरूपों के साथ तुम्हीं जुडी हो, आप को नमस्कार है ।
इस एक श्लोक से श्री दुर्गा देवी के अतुलनीय गुणों की पहचान होती है। आदिशक्ति श्री दुर्गा देवी उन सभी का अवतार हैं जो जीवन को परिपूर्ण बनाती हैं। श्री दुर्गा देवी को जगत जननी कहा जाता है। जगत जननी हम सब की माता होने के नाते बच्चों की पुकार पर दौड़ पड़ती है।
नवरात्रि श्री दुर्गा देवी का त्योहार है जो महिषासुर का वध करने के लिए अवतरित हुई थीं ! घटस्थापना नवरात्रि के प्रथम दिन की जाती है। नौ दिनों तक ब्रह्मांड के रूप में चमकने वाली नंदा दीप के माध्यम से श्री दुर्गा देवी की पूजा करके नवरात्रि उत्सव मनाया जाता है। नवरात्रि देवी का व्रत है और भारत भर में कई जगहों पर इस व्रत को कुलाचार के रूप में भी मनाया जाता है। इस व्रत में नौ दिनों तक भक्तिभाव से देवी की पूजा की जाती है। आज यह कई राज्यों में एक त्यौहार बन गया है। इस त्योहार में दिव्यता से हिंदुओं को लाभ होता है; हालाँकि, नवरात्रि महोत्सव की विकृत प्रकृति के कारण, दिव्यता का लाभ इससे कोसों दूर है; लेकिन इसकी पवित्रता में भी गिरावट आई है। इस पर्व के अनुचित स्वरूप को रोकना और इसकी पवित्रता बनाये रखना, यही समयानुसार धर्म का आचरण भी है!
आइये इस लेख के माध्यम से जानते हैं नवरात्रि व्रत के पीछे का इतिहास, इस व्रत का महत्व और इसे मनाने के पीछे का विज्ञान।
किसने शुरू किया यह व्रत
हिंदी कैलेंडर(पंचांग) के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवमी तिथि तक नवरात्र व्रत मनाया जाता है ।
इस व्रत को करने हेतु ऋषि नारद ने श्रीराम को कहा था, ताकि रावण का वध किया जा सके । इस व्रत के पूरा होने के बाद श्रीराम ने लंका पर आक्रमण किया और अंत में रावण का वध किया। देवी ने प्रतिपदा से नवमी तक नौ दिनों तक राक्षस महिषासुर से युद्ध किया और अंत में नवमी की रात को उसका वध कर दिया। तब से, उन्हें महिषासुर का संहार करने वाली देवी महिषासुरमर्दिनी के रूप में जाना जाने लगा।
महत्व
जब भी तामसिक, राक्षसी और क्रूर लोग शक्तिशाली हो जाते हैं और सात्विक, धार्मिक मनुष्यों को कष्ट देने लगते हैं, तब देवी धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेती हैं। नवरात्र के दौरान, देवी तत्त्व सामान्य से एक हजार गुना अधिक सक्रिय होता है। इस सिद्धांत के अनुसार सर्वाधिक लाभ पाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को “श्री दुर्गा देव्यै नमः” का जाप अधिक से अधिक करना चाहिए।
व्रत करने की विधि
कई परिवारों में यह व्रत पारिवारिक परंपरा के रूप में मनाया जाता है। यह व्रत आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से शुरू होता है । घर में एक पवित्र स्थान पर, एक वेदी (यज्ञ-गृह) का निर्माण किया जाता है और शेर पर बैठी आठ भुजाओं वाली देवी और नवार्ण यंत्र स्थापित किया जाता है। यंत्र के बगल में एक बर्तन (जिसे घट भी कहा जाता है) स्थापित किया जाता है और घट और देवी दोनों की पूजा की जाती है।
नवरात्र के त्यौहार में परंपरा के अनुसार घटस्थापना और माला-बंधन का अनुष्ठान करना चाहिए। खेत से लाई गई रेत से दो अंगुल ऊंचाई के बराबर वर्गाकार आधार तैयार करना चाहिए और उसमें (पांच या) सात प्रकार के अन्न मिला देना चाहिए। ये खाद्यान्न हैं जौ, गेहूं, तिल, मसूर, चना, राल और सावे (विशेष रूप से महाराष्ट्र में पाया जाने वाला खाद्यान्न)।
मिट्टी या तांबे के बर्तन में जल, गंध, फूल, दूर्वा, अक्षत , सुपारी, पांच विशिष्ट पत्ते, पांच रत्न या सिक्के जैसे पदार्थ डालने चाहिए।
सात अनाज और कलश (वरुण, वर्षा के देवता का प्रतीक) की स्थापना के लिए वैदिक मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए, यदि वह नहीं जानते, तो पुराणों के मंत्रों का पाठ करना चाहिए। यदि कोई इन्हें भी नहीं जानता है, तो उसे कहना चाहिए कि अहम् (चढ़ाए गए पदार्थ का नाम लेकर) ‘समर्पयामि’ (अर्पित करता हूं ) और देवता के नाम का जप करता हूं। फूलों की माला इस प्रकार बांधनी चाहिए कि वह गमले के अंदर तक पहुंच जाए।
लगातार नौ दिनों तक प्रतिदिन एक कुमारिका (कुंवारी) की पूजा की जाती है और उसे भोजन कराया जाता है। एक विवाहित महिला प्रकट शक्ति का प्रतीक है जबकि कुमारिका अव्यक्त शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है। चूंकि एक विवाहित महिला में कुछ मात्रा में प्रकट शक्ति का उपयोग हो जाता है, इसलिए कुमारिका में कुल शक्ति एक विवाहित महिला की तुलना में अधिक होती है।
नवरात्र का त्यौहार अपनी वित्तीय क्षमता के अनुसार मनाया जाता है, जिसमें अखंड दीप-प्रज्वलन (लगातार दीपक जलाना), चंडीपाठ (देवी के छंदों का पाठ), ललिता-पूजा (देवी की अनुष्ठानिक पूजा) सहित विभिन्न कार्यक्रम सम्मिलित हैं। व्यक्ति को व्रत, अनुष्ठान के समय जागते रहना चाहिए । भले ही कोई भक्त उपवास कर रहा हो, उसे हमेशा की तरह देवी को नैवेद्य अर्पित करना चाहिए।
इस अवधि के दौरान अच्छे आचरण के तहत दाढ़ी नहीं बनानी चाहिए, कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, बिस्तर या गद्दे पर नहीं सोना चाहिए, गांव की सीमा पार नहीं करनी चाहिए और जूते नहीं पहनने चाहिए।
देवी की मूर्ति के विसर्जन के दौरान, अंकुरित बीज उन्हें अर्पित किए जाते हैं। महिलाएं उन छोटे पौधों को देवी शाकंभरी के रूप में अपने सिर पर रखकर विसर्जन के लिए ले जाती हैं।
अंत में स्थापित घट और देवी को बहते जल में विसर्जित कर देना चाहिए।
प्रार्थना
‘देवी, हम शक्तिहीन हो गए हैं, सुख और कामुक सुखों से माया (महान भ्रम) से जुड़ गए हैं। हे माँ, हमारी शक्ति का स्रोत बनो। आपकी शक्ति से हम दुष्ट प्रवृत्तियों का नाश कर सकेंगे।’
गुजरात में नवरात्र के दौरान मातृशक्ति के प्रतीक के रूप में दीप-गर्भ (कई छिद्रों वाले मिट्टी के बर्तन में रखा हुआ जलता हुआ दीपक) की पूजा की जाती है। महिला प्रजनन क्षमता को दर्शाने के लिए नौ दिनों के दौरान पूजा की जाने वाली ‘दीप-गर्भ’ के कारण गहरे शब्द को हटाकर गरबा – गरभो -गरबो या गरबा शब्द प्रचलित हो गया।
संदर्भ : सनातन ग्रंथ, धार्मिक उत्सव एवं व्रतों का अध्यात्मशास्त्रीय आधार
विशेष आलेख श्रृंखला “पितृपक्ष”
पितृपक्ष विशेष 09: जानिए पितृ ऋण से मुक्ति और आत्मिक शांति के 4 महान तीर्थ
विशेष आलेख श्रृंखला 04 : इन परहेजों और नियमों का पालन करते हुए करना चाहिए श्राद्धकर्म ?
विशेष में पितृपक्ष -2 : जानिए क्या है पितृ दोष ? कारण, लक्षण और मुक्ति के शास्त्रोक्त सिद्ध उपाय
विशेष श्रृंखला : जानिए क्या है नान्दी श्राद्ध और क्यों हैं हर शुभ कार्य से पहले यह अनिवार्य
पिछला विशेष श्रृंखला
त्रिपिंडी श्राद्ध 4 : जानिए क्या है अकाल मृत्यु, इसके बाद किन जगहों पर जाती है आत्मायें
त्रिपिंडी श्राद्ध -5 : अकाल मृत्यु के बाद अतृप्त आत्माओं को परम शांति और मोक्ष कैसे…
त्रिपिंडी श्राद्ध : जानिए..गरुड़ पुराण के अनुसार अकाल मृत्यु के बाद आत्मा का सफर
इन अनुष्ठान से जुड़ी कोई जानकारी या शंका समाधान के लिए “मोक्ष भूमि” के 9889940000 व्हाट्सएप नंबर से निशुल्क या अपने कर्मकांडी ब्राम्हण/विद्वान् से सलाह लेना चाहिए।
लगातार ऐसी ही आध्यात्मिक जानकारी हेतु नीचे दी हुई हरी पट्टी को क्लिक कर “मोक्षभूमि” व्हाट्सएप्प से जुड़े। साथ ही “मोक्ष भूमि” के वेबसाइट, facebook, YouTube, Instagram सहित अन्य सोशल मीडिया पर …
आप इस ज्ञानवर्धक जानकारी को अपने सोशल मीडिया पर शेयर करें ताकि अलग अलग भाषा की इस धार्मिक न्यूज़ पोर्टल “मोक्ष भूमि काशी” की धार्मिक जानकारी अन्य सनातनी को भी मिल सके।

“मोक्ष भूमि” की नई श्रृंखला
भारतीय विवाह की रस्में मुख्यतः तीन भाग में संपन्न होते हैं..विवाह से पहले, विवाह के दिन और विवाह के बाद। “मोक्ष भूमि” से जानिए इनसे जुड़ी एक-एक छोटी बड़ी सभी जानकारियां… पढ़ने के लिए जुड़िये ..
फाइव लेटेस्ट पोस्ट
श्रीकृष्ण की 8 पटरानियाँ: मात्र कथा नहीं, बल्कि स्त्री शक्ति के 8 दिव्य आयाम
डिस्क्लेमर : सभी जानकारियाँ सनातन धार्मिक ग्रंथों, विद्वानों की सलाह और मान्यताओं पर आधारित है। तथ्यों की सटीकता पर संशय के स्थिति पर अपने पुरोहित से सलाह लें ।
<img class=”alignnone size-large wp-image-10274″ src=”https://www.mokshbhumi.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG_20250405_090833-1024×642.webp” alt=”” width=”960″ height=”602″ /
विशिष्ट जानकारियां
Basi Bhojan : आखिर क्यों नहीं खाना चाहिए बासी भोजन, जानिए क्या कहता है शास्त्र
Chanakya ki baten : आजमाएं इन सात आदतों को, जो देती है अल्प समय में ही सफलता
Narad muni : जानिए नारद मुनि के जन्म की रोचक कथा, पूर्वजन्म और श्राप से क्या है संबंध
हनुमान जी की माता अंजना क्यों बनी अप्सरा से वानरी, कौन थे हैं हनुमान जी ने नाना
Hanuman Jyanti : हनुमान जी के पैर के नीचे किसका स्थान है ?
Lord Hanuman: जानिए आखिर तीन पत्नियों के बाद भी हनुमान जी क्यों कहलाते हैं बालब्रह्मचारी ?
Pradosh vrat : जानिए शनि प्रदोष पर पूजा का विधान, क्या है वार के अनुसार प्रदोष व्रत के लाभ
यदि पैर का अंगूठा और उसके पास वाली उंगली दोनों हो बराबर तो मिलता है ये लाभ …..
आखिर 7 दिनों का ही क्यों होता है सप्ताह, जानें इसकी खास वजह
Shaniwar : शनिवार करें ये उपाय, कष्ट होंगे दूर, जीवन में आएगी जबरदस्त बदलाव
Shani dev : आखिर क्यों शनि की सवारी है कौआ, क्या है इसका धार्मिक महत्व, कैसे हुआ शनि का जन्म ?
आखिर क्यों भोजन के समय बात करने की होती है मनाही? जानें क्या कहता है शास्त्र
जानिए मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद क्यों टूट जाता है सामने रखा शीशा?
Eksloki ramayan : एकश्लोकी रामायण में मात्र एक श्लोक में संपूर्ण राम कथा
शनि देव के प्रिय इस पौधे के हैं अनगिनत फायदे, मां लक्ष्मी की कृपा से बदल जाते हैं दिन
जानें आखिर शिव मंदिर में क्यों बजाते है ताली, ये है पौराणिक महत्व
Ullu : आपके घर पर यदि दिखा है उल्लू, तो जानिए क्या है इसके मायने ?
जब विष्णुजी के शरीर से कन्या का हुआ जन्म, जानिए कैसे उत्पन्न हुई एकादशी ?
भैरव को प्रसाद में शराब का चढ़ावा, षड्यंत्र है या परंपरा ? जानिए क्या है धर्म ग्रंथ में
Vastu shastra : कहां रखना चाहिए झाड़ू…? गलत जगह झाड़ू रखने से क्या होता है..
वास्तु : घर में दो शमी के पौधे रखना ठीक या गलत, जानें इसकी दिशा और ख़ास बातें
Ahoi ashtami : संतान प्राप्ति में हो रही है देरी, नहीं ठहरता है गर्भ, इस व्रत से मिलेगी सफलता
चाणक्य की बातें
चाणक्य की बातें : इन 4 तरह के आदतों के लोगों को हमेशा अपने घर से रखे दूर , वरना …
थोड़ा नुकसान उठा लीजिए, मगर जीवन में इन 7 लोगों से कभी मदद मत मांगिए
कथाएं रामायण की ..
Ramayan : श्री राम के अलावा इन योद्धाओं के हाथों मरते-मरते बचा था रावण
कथाएं महाभारत की ..
Mahabharata : क्या गांधारी के श्राप के कारण अफगानिस्तान का हुआ है ये हाल ?
महाभारत से : जानिए रहस्य, आखिर क्यों गंगा ने मार दिया था अपने 7 बेटों को
Mahabharat Katha: किस श्राप के कारण अर्जुन बन गए थे किन्नर?
क्या चीर हरण के समय द्रौपदी रजस्वला थी ? जानिये ‘बोल्ड’ द्रौपदी से जुडी पूरी बातें
जानिये किसका अवतार थीं लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला
जब कर्ण ने श्री कृष्ण से पूछा मेरा दोष क्या था.? पढ़िए श्री कृष्ण का जवाब…
कौन हैं सुदर्शन चक्र ? जानें कैसे बने श्री कृष्ण का अस्त्र
महाभारत काल के वो पांच गांव, जिसकी वजह बना महाभारत युद्ध
निर्जला एकादशी : जानिए जब युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा था एकादशी व्रत की जानकारी, फिर ..
Mata sarasvati : क्या ब्रह्माजी ने अपनी बेटी सरस्वती से विवाह किया था ? जानिए क्या है सच.






Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.