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नवरात्रि विशेष : मां कुष्मांडा और काशी के दुर्गाकुंड का रहस्य, राजा सुदर्शन की अटूट भक्ति और मां के प्रगट होने की कथा

​डॉ संतोष ओझा / काशी

शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की आराधना की जाती है। नवरात्रि की चतुर्थ तिथि को जगतजननी के चौथे स्वरूप मां कुष्मांडा के दर्शन और पूजन का विधान है। मां कुष्मांडा को अपनी मंद हंसी से ब्रह्मांड की रचना करने वाली आदि शक्ति माना जाता है।

​देशभर में मां कुष्मांडा के कई मंदिर हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के वाराणसी (काशी) स्थित दुर्गाकुंड का मंदिर अपनी ऐतिहासिक, पौराणिक और आध्यात्मिक महत्ता के लिए पूरी दुनिया में विशेष स्थान रखता है। मान्यता है कि यह वही पावन भूमि है जहां राजा सुदर्शन की भक्ति से प्रसन्न होकर मां कुष्मांडा साक्षात प्रकट हुई थीं।

​पौराणिक कथा: राजकुमार सुदर्शन और अनजाने में हुआ मंत्र जाप

​देवी भागवत पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, अयोध्या के राजा ध्रुवसंधि की दो रानियां थीं—बड़ी रानी मनोरमा और छोटी रानी लीलावती। दोनों ही देवियों की परम भक्त थीं। मनोरमा के पुत्र का नाम राजकुमार सुदर्शन और लीलावती के पुत्र का नाम शत्रुजीत था।

​एक बार जब राजा ध्रुवसंधि शिकार के लिए जंगल गए, तो एक शेर के आक्रमण में उनकी मृत्यु हो गई। राजा की मृत्यु के पश्चात महर्षि वशिष्ठ ने राजकुमार सुदर्शन को अयोध्या की राजगद्दी सौंपनी चाही। लेकिन छोटी रानी लीलावती के पिता और उज्जैन के राजा युधाजीत को यह स्वीकार नहीं हुआ। उसने अयोध्या पर आक्रमण कर राज्य को तहस-नहस कर दिया।

​बड़ी रानी मनोरमा किसी तरह अपने पुत्र राजकुमार सुदर्शन और मंत्री विट्ठल के साथ राजमहल से बचकर महर्षि भारद्वाज के आश्रम में पहुंच गईं और वहीं शरण ली।

​’क्लीं’ बीज मंत्र का चमत्कार

​आश्रम में रहते हुए एक दिन राजकुमार सुदर्शन अन्य बालकों के साथ खेल रहे थे। खेल-खेल में अन्य बच्चे मंत्री विट्ठल को ‘क्लिब-क्लिब’ कहकर चिढ़ाने लगे (संस्कृत में ‘क्लिब’ का अर्थ नपुंसक होता है)।

​बालक सुदर्शन को लगा कि वे ‘क्लीं-क्लीं’ कह रहे हैं। चूंकि ‘क्लीं’ मां भगवती का अत्यंत शक्तिशाली बीज मंत्र है, इसलिए सुदर्शन उसे खेल-खेल में ही सही उच्चारण समझकर जपने लगे। इस अनन्य और निरंतर जाप से जगतजननी मां भगवती अत्यंत प्रसन्न हुईं।

​काशी नरेश की कन्या शशिकला से विवाह और मां कुष्मांडा का प्राकट्य

​माता भगवती ने काशी नरेश की कन्या शशिकला को स्वप्न में दर्शन दिए और राजकुमार सुदर्शन से विवाह करने का आदेश दिया। नियत समय पर शशिकला के लिए स्वयंवर का आयोजन किया गया।

​जब राजकुमार सुदर्शन और शशिकला का विवाह तय हुआ, तो शत्रु पक्ष के राजा युधाजीत ने अपनी सेना के साथ स्वयंवर स्थल पर आक्रमण कर दिया। चारों तरफ से खुद को घिरा देखकर राजकुमार सुदर्शन ने पूरी श्रद्धा से मां भगवती का ध्यान किया।

​भक्त की पुकार सुनते ही मां कुष्मांडा साक्षात प्रकट हुईं और उन्होंने युधाजीत की विशाल सेना का संहार कर दिया। मां के आशीर्वाद से राजकुमार सुदर्शन विजयी हुए और उनका विवाह काशी नरेश की पुत्री शशिकला के साथ संपन्न हुआ। इसके बाद मां की कृपा से सुदर्शन अयोध्या के प्रतापी राजा बने।

​काशी के दुर्गाकुंड में मां का स्थायी निवास

​युद्ध और संकट टलने के बाद राजा सुदर्शन ने मां कुष्मांडा से प्रार्थना की कि वे काशी नगरी में ही सदा के लिए विराजमान हो जाएं, ताकि इस पावन नगरी के भक्तों का कल्याण हो सके।

​भक्त की इस अचल प्रार्थना से प्रसन्न होकर मां दुर्गा ने काशी के दुर्गाकुंड क्षेत्र को अपना धाम बनाया और वहीं सदा के लिए स्थापित हो गईं।

​आज यही पावन स्थल दुर्गाकुंड मंदिर (मां कुष्मांडा मंदिर) के रूप में पूरे देश में प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर अत्यंत सिद्ध पीठ है। नवरात्रि के चौथे दिन या किसी भी सामान्य मंगलवार और शुक्रवार को जो भी भक्त सच्चे मन और भाव से मां कुष्मांडा के दर्शन करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं और जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।

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Author: Admin Editor MBC

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