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नवरात्रि विशेष : ​क्यों खास है षष्ठी तिथि ? मां कात्यायनी दूर करेंगी आपकी हर मनोकामना और विवाह की बाधाएं


​शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व शक्ति की आराधना का वह महाकुंभ है, जहां देवी के नौ अलग-अलग स्वरूपों की ऊर्जा से संपूर्ण वातावरण सकारात्मक हो जाता है। नवरात्रि की षष्ठी तिथि (छठा दिन) को जगतजननी के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना का विधान है। मां कात्यायनी को अौदार्य, साहस, न्याय और सुयोग्य वर प्राप्ति की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।

​कौन हैं मां कात्यायनी? (स्वरूप का वर्णन)

​पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि कात्यायन ने भगवती आदिशक्ति को अपनी पुत्री के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया, इसीलिए इनका नाम ‘कात्यायनी’ पड़ा।

​विग्रह और रूप: मां कात्यायनी का यह स्वरूप अत्यंत भव्य और तेजोमय है। इनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला और दैदीप्यमान है।
​भुजाएं: मां कात्यायनी चार भुजाओं वाली हैं। उनके ऊपर वाले दाहिने हाथ में अभय मुद्रा (भय दूर करने वाली मुद्रा) और नीचे वाले दाहिने हाथ में वरमुद्रा है। ऊपर वाले बाएं हाथ में तलवार और नीचे वाले बाएं हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित है।
​वाहन: माता का वाहन सिंह (शेर) है, जो उनके अद्वितीय पराक्रम और निर्भीकता को दर्शाता है।

​पौराणिक कथा: क्यों प्रकट हुईं मां कात्यायनी?

​पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, जब महिषासुर नामक राक्षस का अत्याचार तीनों लोकों में हद से ज्यादा बढ़ गया था, तब समस्त देवताओं ने मिलकर उसकी मुक्ति के लिए त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) की ऊर्जा से एक महाशक्ति का आह्वान किया था।

​सबसे पहले महर्षि कात्यायन ने ही इस देवी की विधिवत पूजा और तपस्या की थी। आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी से लेकर शुक्ल पक्ष की षष्ठी तक महर्षि कात्यायन ने इनकी आराधना की। सप्तमी, अष्टमी और नवमी को तीनों दिन इन देवी ने महर्षि कात्यायन की पूजा स्वीकार की और दशमी के दिन महिषासुर का वध करके देवताओं को उसके आतंक से मुक्त कराया। महर्षि कात्यायन द्वारा पूजित होने के कारण ही इन्हें ‘कात्यायनी’ नाम से जाना गया।

​षष्ठी तिथि पर पूजन का महत्व और साधना
​ज्योतिषीय और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से नवरात्रि का छठा दिन बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। मां कात्यायनी आज्ञा चक्र (Ajna Chakra) का संचालन करती हैं। इनकी साधना से साधक को विशेष सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

​1. विवाह की बाधाएं दूर करना:
​धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिन जातकों के विवाह में अड़चनें आ रही हों, या सुयोग्य जीवनसाथी की कामना हो, उनके लिए मां कात्यायनी की पूजा अत्यंत अचूक मानी जाती है। ब्रज की गोपियों ने भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए कालिंदी (यमुना) के तट पर मां कात्यायनी की ही पूजा की थी।

​2. शत्रु नाश और निर्भयता:
​हाथ में तलवार धारण करने वाली मां कात्यायनी अपने भक्तों के जीवन से हर प्रकार के भय, शत्रु बाधा और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करती हैं। इनकी कृपा से व्यक्ति के भीतर नेतृत्व क्षमता और असीम साहस का विकास होता है।

​पूजा की विधि और भोग
​रंग का महत्व: षष्ठी तिथि के दिन लाल या सुनहरे रंग के वस्त्र धारण करना बहुत शुभ माना जाता है। माता को लाल रंग के फूल और गुलाब की माला अति प्रिय है।
​भोग: मां कात्यायनी को शहद (मधु) का भोग अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि शहद का भोग लगाने से भक्तों को मधुर वाणी और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

​मंत्र: मां की आराधना करते समय इस मंत्र का जाप करना चाहिए:

​चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥
​चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥

​नवरात्रि का छठा दिन हमें यह प्रेरणा देता है कि जीवन के संघर्षों और बाधाओं से घबराने के बजाय पूरे साहस और दृढ़ संकल्प के साथ उनका सामना करना चाहिए। सच्चे मन से मां कात्यायनी की आराधना करने से जीवन के सभी कष्ट स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

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Author: Admin Editor MBC

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