Home 2026 त्रिपिंडी श्राद्ध 9 : मृत्यु के कितने दिनों बाद तक कराने का विधान हैं “नारायण बलि”, जानिए इनस

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त्रिपिंडी श्राद्ध 9 : मृत्यु के कितने दिनों बाद तक कराने का विधान हैं “नारायण बलि”, जानिए इनसे जुड़ी शंकाओं का समाधान

– डॉ संतोष वोजा, काशी, विशेष डेस्क

“मोक्ष भूमि काशी” के विशेष श्रृंखला “त्रिपिंडी श्राद्ध” के 9 और आखिरी अंक में जानिए “नारायण बलि”/strong>

नारायण बलि हिंदू धर्मशास्त्रों (विशेषकर गरुड़ पुराण) में वर्णित एक बेहद महत्वपूर्ण और कल्याणकारी वैदिक अनुष्ठान है। यह मुख्य रूप से उन आत्माओं की शांति और मुक्ति के लिए किया जाता है जिनकी अकाल मृत्यु (जैसे दुर्घटना, आत्महत्या, गंभीर बीमारी, सर्पदंश, जल में डूबने या किसी अचानक हादसे में) हुई हो। ऐसी मान्यता है कि अकाल मृत्यु के कारण आत्मा प्रेतयोनि में भटकती रहती है, और नारायण बलि के माध्यम से उसे भगवान विष्णु (नारायण) की कृपा से मुक्ति और सद्गति मिलती है।

1. मृत्यु के कितने दिन बाद तक किया जा सकता है विधान? (समय सीमा)

नारायण बलि विधान को लेकर समय सीमा के दो मुख्य पहलू हैं—तत्काल विधान और बरसों बाद का विधान:

तत्काल विधान (सूतक के बाद): सामान्य तौर पर किसी की अकाल मृत्यु होने पर, घर का सूतक काल समाप्त होने के बाद 11वें दिन या 12वें दिन यह पूजा करवाई जाती है। कुछ परंपराओं में मृत्यु के तीसरे दिन से लेकर नौवें दिन के भीतर भी इसे करने का निर्देश है। यदि माता या पिता में से किसी की मृत्यु हुई है, तो कुछ शास्त्रीय मतों के अनुसार 1 वर्ष के बाद यह अनुष्ठान करने का नियम है।

वर्षों बाद भी संभव (कोई अंतिम समय सीमा नहीं): अगर किसी कारणवश मृत्यु के तुरंत बाद यह पूजा नहीं हो पाई और परिवार में ‘पितृदोष’ के लक्षण दिख रहे हैं (जैसे तरक्की रुकना, संतान न होना, गृहक्लेश), तो मृत्यु के कई वर्षों या दशकों बाद भी नारायण बलि विधान किया जा सकता है। शास्त्रों के अनुसार, जब भी जागृति आए या दोष का पता चले, तब इसे कराया जा सकता है।

सर्वश्रेष्ठ समय (मुहूर्त): यह अनुष्ठान करने के लिए पितृ पक्ष (श्राद्ध के 16 दिन), अमावस्या, शुक्ल पक्ष की एकादशी या द्वादशी तिथि और विशेष नक्षत्रों को सबसे उत्तम माना जाता है।

2. नारायण बलि की संपूर्ण विधि (3 दिवसीय अनुष्ठान)

यह पूजा आमतौर पर किसी पवित्र नदी के तट या तीर्थ स्थल (जैसे नासिक का त्र्यंबकेश्वर, हरिद्वार, गया, या गोकर्ण) पर योग्य सिद्ध ब्राह्मणों द्वारा करवाई जाती है। यह मुख्य रूप से 3 दिनों का अनुष्ठान होता है:

प्रथम दिन: संकल्प और मुख्य अनुष्ठान

पवित्र स्नान व संकल्प: यजमान (पूजा करने वाला व्यक्ति) पवित्र कुंड या नदी में स्नान करके नए वस्त्र धारण करता है और पूजा का मुख्य संकल्प लेता है।

देवताओं का आह्वान: सोने की धातुओं से निर्मित भगवान विष्णु और यमराज की प्रतिमाओं की स्थापना कर पंचदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश, यम और तत्पुरुष) का पूजन किया जाता है।

पुतदाह (सांकेतिक दाह संस्कार): दर्भ (कुशा घास) या गेहूं के आटे से एक पुतला बनाया जाता है, जिसे मृत आत्मा का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों के मंत्रों के साथ इस पुतले का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार किया जाता है ताकि शरीर का मोह छूटे।

पलाशविधि और पिंड दान: पहले दिन शहद, घी और तिल मिलाकर पिंड दान किए जाते हैं।

द्वितीय दिन: एकादशविष्णु श्राद्ध और नागबलि

श्राद्ध कर्म: दूसरे दिन आत्मा की तृप्ति के लिए विशेष रूप से ‘सपिंडीकरण श्राद्ध’ और तर्पण किया जाता है।

नागबलि (यदि आवश्यक हो): यदि कुंडली में सर्प दोष या पितृदोष अत्यधिक भारी हो, तो नारायण बलि के साथ ‘नागबलि’ भी की जाती है, जिसमें आटे के सांप का प्रतीकात्मक संस्कार होता है।

तृतीय दिन: शुद्धि और ब्राह्मण भोज

गणेश पूजन व पुण्य वाचन: तीसरे दिन घर और यजमान की शुद्धि के लिए गणेश जी की पूजा और स्वास्ति वाचन होता है।

ब्राह्मण भोज और दान: विषम संख्या में (1, 3 या 5) योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है, उन्हें वस्त्र, दक्षिणा और सोने के नाग (यदि नागबलि हुई हो) का दान देकर आशीर्वाद लिया जाता है। इसके साथ ही अनुष्ठान संपन्न होता है।

3. इस विधान के मुख्य नियम

सूतक में वर्जित: घर में चल रहे मुख्य सूतक काल (10 दिनों) के दौरान यह पूजा नहीं की जाती; इसे 11वें दिन या उसके बाद ही किया जाता है।

पुरुष पात्रता: शास्त्रों के अनुसार, मुख्य रूप से परिवार का पुरुष सदस्य (पुत्र, भाई या पिता) ही यह पिंड दान और अनुष्ठान व्यक्तिगत रूप से कर सकता है। महिलाएं स्वतंत्र रूप से यह पूजा अकेले नहीं कर सकतीं, वे पति के साथ बैठ सकती हैं।

स्थान का महत्व: घर पर यह पूजा करने के बजाय इसे तीर्थ स्थलों पर करना ही फलदायी माना गया है

क्षेत्र न छोड़ना: तीन दिनों की पूजा के दौरान यजमान को उस तीर्थ क्षेत्र की सीमा से बाहर जाने की अनुमति नहीं होती है।

… ” विराम ” अंतिम 9वा अंक


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Author: Admin Editor MBC

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