विशेष आलेख श्रृंखला 03 : जानिए पितृ पक्ष में पिंड दान और श्राद्ध करने के शुभ समय और तिथियों के क्या है नियम ?
” मोक्ष भूमि ” के इस विशेष श्रृंखला में “नान्दी श्राद्ध” और “पितृ दोष के कारण, लक्षण और सिद्ध उपायों” के बाद पढ़िए..श्राद्ध करने के शुभ समय और तिथियों । सम्पूर्ण जानकारी शास्त्रोक्त परंपरा गरुड़ पुराण व धर्मग्रंथों के सिद्धांतों पर आधारित है। आध्यात्मिक जानकारी के लिए “मोक्षभूमि” जो सोशल मीडिया के सभी प्लेटफार्म पर है कृपया इनसे जुड़िए
संकलन – डॉ संतोष ओझा | काशी
शास्त्रों और स्मृतियों में पितृ पक्ष के दौरान पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म करने के लिए विशेष काल समय (मुहूर्त) और तिथियों के स्पष्ट नियम बताए गए हैं।
1. श्राद्ध कर्म का सबसे शुभ समय (कुतप एवं रोहिण मुहूर्त)
शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध कर्म कभी भी प्रातः काल (सूर्योदय के तुरंत बाद), संध्या काल या रात्रि में नहीं करना चाहिए। इसके लिए दिन का मध्य भाग सर्वश्रेष्ठ माना गया है:
कुतप काल (दोपहर 11:30 से 12:30 के बीच): दिन का 8वां मुहूर्त ‘कुतप काल’ कहलाता है। यह श्राद्ध और तर्पण का सबसे शुभ एवं फलदायी समय माना गया है।
रोहिण काल (दोपहर 12:30 से 01:30 के बीच): कुतप काल के तुरंत बाद का समय रोहिण काल होता है, जो पिंड दान और संकल्प के लिए उत्तम है।
अपराह्न काल (दोपहर 01:30 से 03:30 के बीच): इस समय तक श्राद्ध और ब्राह्मण भोजन का कार्य संपन्न हो जाना चाहिए।
विशेष नियम: तीर्थ स्थलों (जैसे गया जी, बद्रीनाथ ब्रह्मकपाल) पर यदि यात्रियों की भारी भीड़ हो, तो भी दोपहर के समय (कुतप व रोहिण काल) में ही पिंड दान का संकल्प लेना शास्त्रीय दृष्टि से श्रेष्ठ माना जाता है।
2. तिथियों के निर्धारण का नियम
पितृ पक्ष (भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक) में अपने पूर्वजों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि के अनुसार किया जाता है:
निज तिथि (पुण्यतिथि): जिस तिथि (प्रतिपदा से चतुर्दशी) को पूर्वज का देहावसान हुआ हो, पितृ पक्ष की उसी तिथि को उनका श्राद्ध किया जाता है।
सर्वपित्री अमावस्या (महालय): यदि किसी पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, या किसी कारणवश आप उनकी निश्चित तिथि पर श्राद्ध न कर पाए हों, तो आश्विन अमावस्या (सर्वपित्री अमावस्या) को उनका पिंड दान और तर्पण करना सर्वमान्य और पूर्ण फलदायी होता है।
3. विशेष परिस्थितियों के लिए शास्त्रीय नियम
अकाल मृत्यु या दुर्घटना: जिनकी अकाल मृत्यु (दुर्घटना, विष, जल में डूबने या अग्नि से) हुई हो, उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को करने का विधान है।
सौभाग्यवती स्त्रियाँ: जिन स्त्रियों या माताओं की मृत्यु सुहागिन रहते हुई हो, उनका श्राद्ध नवमी तिथि (मातृ नवमी) को करना शुभ माना जाता है।
संन्यासी एवं यति: संन्यासियों, साधुओं या योगियों का श्राद्ध द्वादशी तिथि को किया जाता है।
नाना-नानी का श्राद्ध: नाना-नानी के लिए श्राद्ध का विधान प्रतिपदा तिथि या आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को होता है।
4. तीर्थ श्राद्ध से जुड़े मुख्य नियम
तीर्थ में तिथि का बंधन नहीं: सामान्यतः घर पर निज तिथि को ही श्राद्ध होता है, लेकिन गया जी, प्रयागराज, पुष्कर या ब्रह्मकपाल जैसे महातीर्थों में प्रवेश करते ही आप किसी भी दिन (पितृ पक्ष के दौरान) अपने सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों का पिंडदान और तर्पण कर सकते हैं।
वर्जित काल: ग्रहण काल (यदि सूर्य या चंद्र ग्रहण हो) में तर्पण किया जा सकता है, परंतु रात्रि के समय पिंड दान पूरी तरह वर्जित है।
वर्ष में श्राद्ध के अवसर
12 अमावस्या, 4 युग तिथि, 14 मनुवादी तिथि, 12 संक्रांति, 12 विद्युत योग, 12 व्यतिपात योग, 15 महालय श्राद्ध का तथा 5 पर्व वेद्य|
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