त्रिपिंडी श्राद्ध – 8 : त्रिपिंडी श्राद्ध का अर्थ, तीन पिंड का महत्व और शंका-समाधान
“मोक्ष भूमि काशी” के विशेष श्रृंखला “त्रिपिंडी श्राद्ध” के 9 अंक के इस श्रृंखला का 8 वें अंक में जानिए त्रिपिंडी श्राद्ध का रहस्य /strong>
त्रिपिंडी श्राद्ध क्या है और क्यों है आवश्यक?
तीर्थस्थल पर अपने पितरों को संबोधित कर जो विशेष उदेश्य से श्राद्ध कर्म किया जाता है, उसे त्रिपिंडी श्राद्ध कहते हैं।
सामान्यतः श्राद्ध केवल तीन पीढ़ियों (पिता, दादा और परदादा) तक ही सीमित होता है। परंतु, त्रिपिंडी श्राद्ध के माध्यम से हमारे कुल के उन अज्ञात, पूर्व की पीढ़ियों के पितरों को भी तृप्ति मिलती है जो किसी कारणवश सद्गति को प्राप्त नहीं हुए, दुर्गतियों में भटके हुए हैं या प्रेतयोनि में रहकर परिवार को कष्ट दे रहे हैं। भूमि, अंतरिक्ष और आकाश—इन तीनों स्थानों में स्थित आत्माओं की मुक्ति के लिए यह अनुष्ठान रामबाण माना गया है।
विशेष परामर्श: प्रत्येक परिवार को प्रति 12 वर्ष में एक बार यह विधि अवश्य करनी चाहिए। यदि कुंडली में पितृदोष हो या पितरों के कारण जीवन में लगातार कष्ट आ रहे हों, तो दोष निवारण के लिए इसे तुरंत करना हितकर होता है।
अब जानिए उचित काल (समय) और वर्जित समय
उचित तिथियां: अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा और संपूर्ण पितृपक्ष इस विधि के लिए सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं।
वर्जित समय: गुरु-शुक्रास्त (तारा डूबने पर), गणेशोत्सव और शारदीय नवरात्र के दौरान यह विधि नहीं करनी चाहिए।
विशेष नियम: परिवार में किसी मंगलकार्य (जैसे विवाह) या किसी अशुभ घटना (मृत्यु) के उपरांत एक वर्ष तक त्रिपिंडी श्राद्ध न करें।
अपवाद: यदि एक मंगलकार्य के बाद कुछ ही महीनों के अंतराल पर दूसरा मंगलकार्य तय हो, तो दोनों के मध्यकाल में त्रिपिंडी श्राद्ध किया जा सकता है।
त्रिपिंडी श्राद्ध हेतु सर्वश्रेष्ठ तीर्थ स्थान
यह अनुष्ठान केवल चुनिंदा पवित्र तीर्थों पर ही फलदायी होती है:
काशी (वाराणसी) – मोक्ष नगरी
त्र्यंबकेश्वर (नासिक)
गोकर्ण
महाबलेश्वर
गरुडेश्वर
हरिहरेश्वर (दक्षिण काशी)
संपूर्ण पूजा पद्धति और तीन पिंडों का रहस्य
तीर्थ स्नान के उपरांत श्राद्ध का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद भगवान महाविष्णु और आमंत्रित ब्राह्मणों की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। इस विधि में जौ (यव), व्रीहि (साफ चावल) और तिल के आटे से तीन विशेष पिंड बनाए जाते हैं:
यवपिंड (धर्मपिंड): यह पितृ और मातृवंश के उन मृत व्यक्तियों के लिए होता है जिनकी उत्तरक्रिया (अंतिम संस्कार/श्राद्ध) न हुई हो, जो संतानहीन रहे हों, या जन्म से नेत्रहीन/अपंग होने के कारण अविवाहित रहे हों। इससे उनका प्रेतत्व नष्ट होता है।
मधुरत्रययुक्त व्रीहीपिंड: इस चावल के पिंड पर चीनी, शहद (मधु) और घी (मधुरत्रय) चढ़ाया जाता है। इससे अंतरिक्ष में भटक रहे पितरों को सद्गति मिलती है।
तिलपिंड: पृथ्वी पर क्षुद्र योनि (भूत-प्रेत आदि) में रहकर कष्ट पा रहे और दूसरों को कष्ट दे रहे पितरों को इस पिंड से मुक्ति मिलती है।
अंतिम चरण: तीनों पिंडों पर तिलोदक (तिल और जल) अर्पित कर पूजा की जाती है। श्री विष्णु जी के लिए तर्पण करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और दक्षिणा में वस्त्र, पात्र, पंखा तथा पादत्राण (चप्पल/जूते) आदि दान किए जाते हैं।
महत्वपूर्ण नियम और शंका-समाधान
क्या माता-पिता के जीवित रहते पुत्र यह श्राद्ध कर सकता है?
हाँ, यदि पुत्र की कुंडली में भारी पितृदोष हो, तो माता-पिता के जीवित होते हुए भी दोष निवारण के लिए पुत्र यह विधि कर सकता है।
केश मुंडवाएं या नहीं?
यदि श्राद्धकर्ता के पिता जीवित नहीं हैं, तो उसे अनिवार्य रूप से विधि के समय केश मुंडवाने (मुंडन) चाहिए। यदि पिता जीवित हैं, तो मुंडन की आवश्यकता नहीं है।
क्या घर के अन्य सदस्यों के लिए पूजा-पाठ वर्जित हो जाता है?
नहीं। त्रिपिंडी श्राद्ध में सूतक (अशौच) केवल विधि करने वाले मुख्य श्राद्धकर्ता को ही लगता है, परिवार के अन्य सदस्यों को नहीं। इसलिए घर के अन्य लोग अपनी नियमित पूजा-पाठ जारी रख सकते हैं।
श्राद्ध और त्रिपिंडी श्राद्ध में भेद
तीर्थस्थल पर पितरों को संबोधित कर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे तीर्थ श्राद्ध कहते हैं । हमारे लिए अज्ञात, सद्गति को प्राप्त न हुए अथवा दुुर्गति को प्राप्त तथा कुल के लोगों को कष्ट देनेवाले पितरों को, उनका प्रेतत्व दूर होकर सद्गति मिलने के लिए अर्थात भूमि, अंतरिक्ष एवं आकाश, तीनों स्थानों में स्थित आत्माओं को मुक्ति देने हेतु त्रिपिंडी करने की पद्धति है ।
श्राद्ध साधारणतः एक पितर अथवा पिता-पितामह (दादा)-प्रपितामह (परदादा) के लिए किया जाता है । अर्थात, यह तीन पीढियों तक ही सीमित होता है । परंतु त्रिपिंडी श्राद्ध से उसके पूर्व की पीढियों के पितरों को भी तृप्ति मिलती है । प्रत्येक परिवार में यह विधि प्रति बारह वर्ष करें; परंतु जिस परिवार में पितृदोष अथवा पितरों द्वारा होने वाले कष्ट हों, वे यह विधि दोष निवारण हेतु करें ।
विधि के लिए उचित काल : त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा – ये तिथियां एवं संपूर्ण पितृपक्ष उचित होता है ।
गुरु शुक्रास्त, गणेशोत्सव एवं शारदीय नवरात्र की कालावधि में यह विधि न करें । उसी प्रकार, परिवार में मंगलकार्य के उपरांत अथवा अशुभ घटना के उपरांत एक वर्ष तक त्रिपिंडी श्राद्ध न करें । अत्यंत अपरिहार्य हो, उदा. एक मंगलकार्य के उपरांत पुनः कुछ माह के अंतराल पर दूसरा मंगलकार्य नियोजित हो, तो दोनों के मध्यकाल में त्रिपिंडी श्राद्ध करें ।
विधि हेतु उचित स्थान : त्र्यंबकेश्वर, गोकर्ण, महाबलेश्वर, गरुडेश्वर, हरिहरेश्वर (दक्षिण काशी), काशी (वाराणसी) – ये स्थान त्रिपिंडी श्राद्ध करने हेतु उचित हैं ।
पद्धति : ‘प्रथम तीर्थ में स्नान कर श्राद्ध का संकल्प करें । तदुपरांत महाविष्णु की एवं श्राद्ध के लिए बुलाए गए ब्राह्मणों की पूजा श्राद्ध विधि के अनुसार करें । तत्पश्चात यव (जौ), व्रीहि (कीटक न लगे चावल) एवं तिल के आटे का एक-एक पिंड बनाएं । दर्भ फैलाकर उस पर तिलोदक छिडक कर पिंडदान करें ।
यवपिंड (धर्मपिंड) : पितृवंश के एवं मातृवंश के जिन मृत व्याक्तियों की उत्तरक्रिया न हुई हो, संतान न होने के कारण जिनका पिंडदान न किया गया हो अथवा जो जन्म से ही अंधे-लूले थे (नेत्रहीन-अपंग होने के कारण जिनका विवाह न हुआ हो इसलिए संतान रहित), ऐसे पितरों का प्रेतत्व नष्ट हो एवं उन्हें सद्गति प्राप्त हो, इसलिए यव पिंंड प्रदान किया जाता है। इसे धर्म पिंड की संज्ञा दी गई है ।
मधुरत्रययुक्त व्रीहीपिंड : पिंड पर चीनी, मधु एवं घी मिलाकर चढाते हैं; इसे मधुरत्रय कहते हैं । इससे अंतरिक्ष में स्थित पितरों को सद्गति मिलती है ।
तिलपिंड : पृथ्वी पर क्षुद्र योनि में रहकर अन्यों को कष्ट देने वाले पितरों को तिलपिंड से सद्गति प्राप्त होती है ।
इन तीनों पिंडों पर तिलोदक अर्पित करें । तदुपरांत पिंडों की पूजा कर अघ्र्य दें । श्री विष्णु के लिए तर्पण करें । ब्राह्मणों को भोजन करवाकर उन्हें दक्षिणा के रूप में वस्त्र, पात्र, पंखा, पादत्राण इत्यादि वस्तुएं दें ।’
पितृदोष हो, तो माता-पिता के जीवित होते हुए भी पुत्र का विधि करना उचित : श्राद्धकर्ता की कुंडली में पितृदोष हो, तो दोष दूर करने हेतु माता-पिता के जीवित होते हुए भी इस विधि को करें ।
विधि के समय केश मुंडवाने की आवश्यकता : श्राद्धकर्ता के पिता जीवित न हों, तो उसे विधि करते समय केश मुंडवाने चाहिए । जिसके पिता जीवित हैं, उस श्राद्धकर्ता को केश मुंडवाने की आवश्यकता नहीं है ।
घर का कोई सदस्य विधि कर रहा हो, तब अन्य सदस्यों द्वारा पूजा इत्यादि होना उचित है । त्रिपिंडी श्राद्ध में श्राद्धकर्ता के लिए ही अशौच होता है, अन्य परिजनों के लिए नहीं । इसलिए घर का कोई सदस्य विधि कर रहा हो, तो अन्यों के लिए पूजा इत्यादि बंद करना आवश्यक नहीं है ।
…अंतिम 9वा अंक
अब तक आपने पढ़ा
त्रिपिंडी श्राद्ध 4 : जानिए क्या है अकाल मृत्यु, इसके बाद किन जगहों पर जाती है आत्मायें
त्रिपिंडी श्राद्ध -5 : अकाल मृत्यु के बाद अतृप्त आत्माओं को परम शांति और मोक्ष कैसे…
त्रिपिंडी श्राद्ध : जानिए..गरुड़ पुराण के अनुसार अकाल मृत्यु के बाद आत्मा का सफर
इन अनुष्ठान से जुड़ी कोई जानकारी या शंका समाधान के लिए “मोक्ष भूमि” के 9889940000 व्हाट्सएप नंबर से निशुल्क या अपने कर्मकांडी ब्राम्हण/विद्वान् से सलाह लेना चाहिए।
लगातार ऐसी ही आध्यात्मिक जानकारी हेतु नीचे दी हुई हरी पट्टी को क्लिक कर “मोक्षभूमि” व्हाट्सएप्प से जुड़े। साथ ही “मोक्ष भूमि” के वेबसाइट, facebook, YouTube, Instagram सहित अन्य सोशल मीडिया पर …
आप इस ज्ञानवर्धक जानकारी को अपने सोशल मीडिया पर शेयर करें ताकि अलग अलग भाषा की इस धार्मिक न्यूज़ पोर्टल “मोक्ष भूमि काशी” की धार्मिक जानकारी अन्य सनातनी को भी मिल सके।

“मोक्ष भूमि” की नई श्रृंखला
भारतीय विवाह की रस्में मुख्यतः तीन भाग में संपन्न होते हैं..विवाह से पहले, विवाह के दिन और विवाह के बाद। “मोक्ष भूमि” से जानिए इनसे जुड़ी एक-एक छोटी बड़ी सभी जानकारियां… पढ़ने के लिए जुड़िये ..
फाइव लेटेस्ट पोस्ट
श्रीकृष्ण की 8 पटरानियाँ: मात्र कथा नहीं, बल्कि स्त्री शक्ति के 8 दिव्य आयाम
डिस्क्लेमर : सभी जानकारियाँ सनातन धार्मिक ग्रंथों, विद्वानों की सलाह और मान्यताओं पर आधारित है। तथ्यों की सटीकता पर संशय के स्थिति पर अपने पुरोहित से सलाह लें ।
<img class=”alignnone size-large wp-image-10274″ src=”https://www.mokshbhumi.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG_20250405_090833-1024×642.webp” alt=”” width=”960″ height=”602″ /
विशिष्ट जानकारियां
Basi Bhojan : आखिर क्यों नहीं खाना चाहिए बासी भोजन, जानिए क्या कहता है शास्त्र
Chanakya ki baten : आजमाएं इन सात आदतों को, जो देती है अल्प समय में ही सफलता
Narad muni : जानिए नारद मुनि के जन्म की रोचक कथा, पूर्वजन्म और श्राप से क्या है संबंध
हनुमान जी की माता अंजना क्यों बनी अप्सरा से वानरी, कौन थे हैं हनुमान जी ने नाना
Hanuman Jyanti : हनुमान जी के पैर के नीचे किसका स्थान है ?
Lord Hanuman: जानिए आखिर तीन पत्नियों के बाद भी हनुमान जी क्यों कहलाते हैं बालब्रह्मचारी ?
Pradosh vrat : जानिए शनि प्रदोष पर पूजा का विधान, क्या है वार के अनुसार प्रदोष व्रत के लाभ
यदि पैर का अंगूठा और उसके पास वाली उंगली दोनों हो बराबर तो मिलता है ये लाभ …..
आखिर 7 दिनों का ही क्यों होता है सप्ताह, जानें इसकी खास वजह
Shaniwar : शनिवार करें ये उपाय, कष्ट होंगे दूर, जीवन में आएगी जबरदस्त बदलाव
Shani dev : आखिर क्यों शनि की सवारी है कौआ, क्या है इसका धार्मिक महत्व, कैसे हुआ शनि का जन्म ?
आखिर क्यों भोजन के समय बात करने की होती है मनाही? जानें क्या कहता है शास्त्र
जानिए मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद क्यों टूट जाता है सामने रखा शीशा?
Eksloki ramayan : एकश्लोकी रामायण में मात्र एक श्लोक में संपूर्ण राम कथा
शनि देव के प्रिय इस पौधे के हैं अनगिनत फायदे, मां लक्ष्मी की कृपा से बदल जाते हैं दिन
जानें आखिर शिव मंदिर में क्यों बजाते है ताली, ये है पौराणिक महत्व
Ullu : आपके घर पर यदि दिखा है उल्लू, तो जानिए क्या है इसके मायने ?
जब विष्णुजी के शरीर से कन्या का हुआ जन्म, जानिए कैसे उत्पन्न हुई एकादशी ?
भैरव को प्रसाद में शराब का चढ़ावा, षड्यंत्र है या परंपरा ? जानिए क्या है धर्म ग्रंथ में
Vastu shastra : कहां रखना चाहिए झाड़ू…? गलत जगह झाड़ू रखने से क्या होता है..
वास्तु : घर में दो शमी के पौधे रखना ठीक या गलत, जानें इसकी दिशा और ख़ास बातें
Ahoi ashtami : संतान प्राप्ति में हो रही है देरी, नहीं ठहरता है गर्भ, इस व्रत से मिलेगी सफलता
चाणक्य की बातें
चाणक्य की बातें : इन 4 तरह के आदतों के लोगों को हमेशा अपने घर से रखे दूर , वरना …
थोड़ा नुकसान उठा लीजिए, मगर जीवन में इन 7 लोगों से कभी मदद मत मांगिए
कथाएं रामायण की ..
Ramayan : श्री राम के अलावा इन योद्धाओं के हाथों मरते-मरते बचा था रावण
कथाएं महाभारत की ..
Mahabharata : क्या गांधारी के श्राप के कारण अफगानिस्तान का हुआ है ये हाल ?
महाभारत से : जानिए रहस्य, आखिर क्यों गंगा ने मार दिया था अपने 7 बेटों को
Mahabharat Katha: किस श्राप के कारण अर्जुन बन गए थे किन्नर?
क्या चीर हरण के समय द्रौपदी रजस्वला थी ? जानिये ‘बोल्ड’ द्रौपदी से जुडी पूरी बातें
जानिये किसका अवतार थीं लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला
जब कर्ण ने श्री कृष्ण से पूछा मेरा दोष क्या था.? पढ़िए श्री कृष्ण का जवाब…
कौन हैं सुदर्शन चक्र ? जानें कैसे बने श्री कृष्ण का अस्त्र
महाभारत काल के वो पांच गांव, जिसकी वजह बना महाभारत युद्ध
निर्जला एकादशी : जानिए जब युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा था एकादशी व्रत की जानकारी, फिर ..
Mata sarasvati : क्या ब्रह्माजी ने अपनी बेटी सरस्वती से विवाह किया था ? जानिए क्या है सच.






Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.