विशेष श्रृंखला – पितृ दोष और प्रेत बाधा से मुक्ति का अनुष्ठान : त्रिपिंडी श्राद्ध, जानिए इसे जुड़ी सभी जानकारी संग महामंत्र
“मोक्ष भूमि काशी” के विशेष श्रृंखला “त्रिपिंडी श्राद्ध” के 9 अंक के इस श्रृंखला का पहला भाग
सनातन धर्म में पित्रों की आत्मा की शांति और उनकी तृप्ति के लिए श्राद्ध कर्म को बेहद अनिवार्य माना गया है। सामान्यतः लोग प्रतिवर्ष पितृपक्ष या पुण्यतिथि पर अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं। लेकिन कई बार अनजाने में या किन्हीं विशेष परिस्थितियों के कारण जब लगातार 3 वर्षों तक पूर्वजों का श्राद्ध नहीं हो पाता, तो पितर रुष्ट हो जाते हैं और वे ‘प्रेत योनि’ (अतृप्त अवस्था) में प्रवेश कर जाते हैं। ऐसी स्थिति में वंशजों को पितृदोष का दंश झेलना पड़ता है।
इसी भयंकर पितृदोष, अकाल मृत्यु जनित दोष और अतृप्त आत्माओं की शांति के लिए शास्त्रों में एक विशेष अनुष्ठान का विधान है, जिसे ‘त्रिपिंडी श्राद्ध’ (Tripindi Shraddha) कहा जाता है। आइए “मोक्ष भूमि” के इस विशेष श्रृंखला में जानते हैं क्या है यह अनुष्ठान, यह किनके लिए किया जाता है और इसमें किन देवताओं का आह्वान होता है। इस अनुष्ठान से जुड़ी कोई भी जानकारी या शंका समाधान के लिए 9889940000 पर व्हाट्सएप कर निशुल्क मदद ली जा सकती है.. इस अंक में जानिए “त्रिपिंडी श्राद्ध” की प्रारंभिक बातें…
क्या है त्रिपिंडी श्राद्ध ?
त्रिपिंडी श्राद्ध एक ‘काम्य श्राद्ध’ है, जिसका अर्थ है किसी विशेष मनोकामना या दोष निवारण के लिए किया जाने वाला अनुष्ठान। ‘त्रिपिंडी’ शब्द का अर्थ है तीन पिंडों का अर्पण। यह अनुष्ठान तीन अलग-अलग प्रवृत्तियों (सत्व, रज और तम) से पीड़ित और तीन पीढ़ियों की अतृप्त आत्माओं को प्रेतबाधा से मुक्त कराकर पितृलोक या मोक्ष की ओर अग्रसर करने के लिए किया जाता है।
श्राद्ध कमलाकर ग्रंथ के अनुसार, यदि पूर्वजों का नियमित श्राद्ध न किया जाए, तो परिवार में अशांति, विवाह में देरी, संतान हीनता, असाध्य बीमारियां और व्यापार में घाटा जैसी समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं। त्रिपिंडी श्राद्ध इन सभी कष्टों का एकमात्र अकाट्य उपाय है।
किनके लिए किया जाता है यह अनुष्ठान?
यह अनुष्ठान मुख्य रूप से उन पूर्वजों या आत्माओं के लिए किया जाता है जो
अतृप्त आत्माएं – जिनका अंतिम संस्कार ठीक से न हुआ हो या जिनकी मृत्यु के बाद लगातार तीन साल तक श्राद्ध न किया गया हो।
अकाल मृत्यु – जो लोग बाल्यावस्था, युवावस्था या वृद्धावस्था में दुर्घटना, बीमारी, आत्महत्या या किसी भी प्रकार की अकाल (अप्राकृतिक) मृत्यु को प्राप्त हुए हों।
अज्ञात पूर्वज – शास्त्रों के अनुसार, इस अनुष्ठान में केवल ज्ञात ही नहीं, बल्कि अज्ञात पूर्वजों (अनादिष्ट गोत्र) का भी श्राद्ध किया जाता है, जिनका नाम या गोत्र हमें ज्ञात नहीं है लेकिन वे परिवार को अदृश्य रूप से कष्ट दे रहे हैं।

कौन कर सकता है यह श्राद्ध ?
इस अनुष्ठान को विवाहित जोड़ा (पति-पत्नी साथ में), अविवाहित पुरुष या विधुर भी कर सकते हैं। यदि मुख्य श्राद्धकर्ता (पुत्र) उपलब्ध न हो, तो परिवार की सहमति से अन्य परिजन भी इसे संपन्न कर सकते हैं। केवल अकेली महिला को इसे स्वतंत्र रूप से करने का अधिकार नहीं होता।
इस विशेष अनुष्ठान में क्या होता है ?
त्रिपिंडी श्राद्ध एक दिवसीय अनुष्ठान है जो लगभग 2 से 3 घंटे तक चलता है। इसकी मुख्य प्रक्रिया इस प्रकार है:
1. पवित्र स्नान व संकल्प – श्राद्धकर्ता सर्वप्रथम तीर्थ (जैसे नासिक के त्र्यंबकेश्वर में कुशावर्त कुंड या वाराणसी के पिशाच मोचन कुंड) पर पवित्र स्नान करता है और श्वेत वस्त्र धारण कर संकल्प लेता है।
2. तीन पिंडों का निर्माण व अर्पण – इस पूजा में तीन अलग-अलग अनाजों से तीन विशेष पिंड बनाए जाते हैं:
जौ (यव) का पिंड – यह मृत आत्माओं के आध्यात्मिक उत्थान और सत्वगुणी शांति के लिए होता है।
चावल (व्रीहि) का पिंड – यह रजोगुणी आत्माओं की शांति के लिए अंतरिक्ष में भटक रही आत्माओं को तृप्त करता है।
काले तिल का पिंड – यह तमोगुणी, प्रेत योनि या भूमि पर भटक रही अतृप्त आत्माओं की मुक्ति के लिए होता है।
3. तर्पण – मंत्रोच्चारण के साथ पितरों को जल और काले तिल का तर्पण दिया जाता है। इसके बाद पवित्र अग्नि में आहुतियां देकर पितृयज्ञ संपन्न किया जाता है।
4. ब्राह्मण भोजन और दान – अनुष्ठान के अंत में ब्राह्मणों को सात्विक भोजन कराया जाता है और वस्त्र, अन्न व दक्षिणा का दान देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।
अनुष्ठान में किन-किन देवताओं का होता है आह्वान ?
त्रिपिंडी श्राद्ध में समस्त सृष्टि के नियंत्रक और त्रिदेवों का आह्वान किया जाता है। इन तीनों पिंडों में साक्षात त्रिदेवों की ऊर्जा का वास माना जाता है, जो प्रेत आत्माओं का उद्धार करते हैं:
भगवान ब्रह्मा (रजत/चांदी की मूर्ति)
ब्रह्मा जी का आह्वान कर जौ के पिंड द्वारा सत्वगुणी प्रेत आत्माओं को मुक्ति दिलाई जाती है।
भगवान विष्णु (स्वर्ण की मूर्ति)
विष्णु जी का आह्वान कर चावल के पिंड द्वारा रजोगुणी आत्माओं का उद्धार किया जाता है।
भगवान रुद्र/महेश (ताम्र/तांबे की मूर्ति)
भगवान शिव का आह्वान कर तिल के पिंड द्वारा तमोगुणी और सबसे उग्र प्रेत आत्माओं को शांत किया जाता है।
इसके अलावा, पूजा में दसों दिशाओं के दिग्पालों, यमराज और दिव्य पितरों का आह्वान कर उनसे रक्षा और मुक्ति की प्रार्थना की जाती है।
महामंत्र: जिसके बिना अधूरा है अनुष्ठान
त्रिपिंडी श्राद्ध के दौरान पुरोहितों द्वारा पितरों की प्रसन्नता के लिए वेदोक्त मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। इस अनुष्ठान का सबसे मुख्य और दिव्य महामंत्र नीचे दिया गया है, जिसे तर्पण और पिंड दान के समय पढ़ा जाता है:
ॐ नमो वः पितरो रसाय नमो वः पितरः शोषाय नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधाय नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मनवे नमो वः पितरः पितरो नमो वः॥
( हे पितर देव! आपके रस रूप को नमस्कार है, आपके शोष (तेज) रूप को नमस्कार है, आपके जीव (प्राण) रूप को नमस्कार है। आपकी स्वधा (तृप्ति) को नमस्कार है। आपके घोर (क्रोधित) रूप को हम शांत करने के लिए नमन करते हैं और आपके मन्यु (मन की प्रसन्नता) को नमस्कार करते हैं। आप हम पर प्रसन्न हों।)
इसके अतिरिक्त, समस्त ज्ञात-अज्ञात पित्रों की मुक्ति के लिए इस श्लोक का आह्वान किया जाता है:
पितृवंशे मृता ये च मातृवंशे तथैव च।गुरुश्वशुरबंधूनां ये चान्ये बांधवाः स्मृताः॥
ये मे कुले लुप्तपिंडा पुत्रदाराविवर्जिताः। तेषां पिण्डो मया दत्तो अक्षय्यमुपतिष्ठतु॥( मेरे पिता के वंश में, माता के वंश में, गुरु, ससुर या अन्य कोई भी संबंधी जो इस संसार से जा चुके हैं; या मेरे कुल में जिनका पिंड लोप हो चुका है, जो संतानहीन होने के कारण अतृप्त हैं, उन सभी को मैं यह पिंड अर्पित करता हूँ, उन्हें अक्षय तृप्ति और मोक्ष प्राप्त हो।)
अनुष्ठान के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थान और समय
शास्त्रों के अनुसार त्रिपिंडी श्राद्ध किसी भी पवित्र तीर्थ स्थल पर किया जा सकता है, परंतु त्र्यंबकेश्वर (नासिक), पिशाच मोचन तीर्थ (वाराणसी) और गया जी (बिहार) को इसके लिए सर्वोत्तम माना गया है। समय की बात करें तो पितृपक्ष, अमवास्या, अष्टमी या द्वादशी तिथि और सूर्य के कन्या या तुला राशि में गोचर (सितंबर से नवंबर के बीच) के दौरान इसे करना सबसे अधिक फलदायी माना जाता है।
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