काशी के 56 विनायकों में अद्भुत हैं ‘श्री ज्येष्ठ विनायक’: जानिए सृष्टि के आरंभ से जुड़ा इनका पौराणिक रहस्य और सही स्थान
– भगवान शिव के अनुसार, समाज में श्रेष्ठता, उच्च पद, सम्मान और समृद्धि की प्राप्ति के लिए ‘ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी’ के दिन ज्येष्ठ विनायक का विशेष पूजन-अर्चन करना चाहिए।
काशी, जिसे स्वयं भगवान शिव का ‘आनन्दवन’ कहा जाता है, केवल एक नगरी नहीं बल्कि अध्यात्म और मोक्ष का जीवन्त विग्रह है। काशी की रक्षा और यहाँ आने वाले भक्तों की निर्विघ्न मुक्ति के लिए स्वयं विघ्नहर्ता भगवान गणेश ने यहाँ ५६ स्वरूपों (छप्पन विनायक) में सात आवरणों के रूप में घेरा बना रखा है।
स्कन्दपुराण के काशीखण्ड एवं सनातन धर्मग्रन्थों के अनुसार, इन्हीं छप्पन विनायकों में पाँचवें आवरण के आठ रक्षक विनायकों में विशेष स्थान रखने वाले ‘श्री ज्येष्ठ विनायक’ की महिमा अद्भुत है। आइए जानते हैं काशीपुरा, कर्णघंटा स्थित इस अति प्राचीन और चमत्कारी मंदिर के पौराणिक इतिहास, धार्मिक माहात्म्य और इसके सही भौगोलिक स्थान के बारे में।
#काशी_के_अग्रपूज्य: सृष्टि के आरम्भ से जुड़े हैं ज्येष्ठ विनायक के तार
धर्मग्रन्थों के अनुसार, एक बार माता पार्वती ने देवाधिदेव महादेव से प्रश्न किया कि काशी के महापुण्यमय क्षेत्र में स्थित ‘ज्येष्ठ विनायक’ कौन हैं और उनकी महिमा क्या है? तब भगवान शिव ने परम प्रसन्न होकर ज्येष्ठ विनायक के प्राकट्य का रहस्य उजागर किया।
शिवजी ने बताया:
विद्धि: देवि प्रवक्ष्यामि ज्येष्ठं नाम विनायकम्।
यः काशीनिलये नित्यं सर्वकामप्रदो नृणाम्॥२१
पुरा किल विधात्रा वै सृष्टेः पूर्वं सुनिश्चितम्।
विघ्नानां नाशनार्थाय ज्येष्ठं रूपं विनिर्मितम्२२
अर्थात्, सृष्टि के आरम्भ से पूर्व ही जब ब्रह्मा जी तीनों लोकों की रचना कर रहे थे, तब वे अनेक विघ्नों के कारण त्रस्त और विषण्ण (दुःखी) हो गए। तब ब्रह्मा जी ने गणेश जी का अनन्य ध्यान किया। ब्रह्मा जी की पुकार पर गणेश जी अपने दिव्य तेज के साथ प्रकट हुए, सृष्टि के सारे विघ्नों का समूल नाश किया और ‘ज्येष्ठ रूप’ धारण कर काशी में ही स्थायी रूप से विराजमान हो गए। ज्येष्ठा नक्षत्र में प्रकट होने तथा देवताओं में आद्य (अग्रपूज्य) होने के कारण इनका नाम ‘ज्येष्ठ विनायक’ पड़ा।
दर्शन और पूजन का माहात्म्य: नष्ट होते हैं जन्म-जन्मान्तर के पाप
शिवपुराण और काशीखण्ड में स्पष्ट कहा गया है कि ज्येष्ठ विनायक के दर्शन मात्र से मनुष्यों के बड़े से बड़े पापों का शमन हो जाता है:
नात्र विघ्नं न च क्लेशं न दारिद्र्यं न संशयम्।
ज्येष्ठराजस्य दर्शनं सर्वशोकविनाशनम्॥३२
सर्वशोक और दरिद्रता का नाश: जो भक्त इस विग्रह का नित्य दर्शन करता है, उसके जीवन से विघ्न, क्लेश, मानसिक संशय और दरिद्रता हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं।
जीवन्मुक्ति की प्राप्ति: यह विग्रह भगवान शिव को अत्यधिक प्रिय है और काशी में मुक्ति मार्ग का अधिपति है। श्रद्धापूर्वक इनके दर्शन करने वाला साधक जीवन्मुक्त हो जाता है।
ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी का विशेष महत्त्व: भगवान शिव के अनुसार, समाज में श्रेष्ठता, उच्च पद, सम्मान और समृद्धि की प्राप्ति के लिए ‘ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी’ के दिन ज्येष्ठ विनायक का विशेष पूजन-अर्चन करना चाहिए।
शास्त्रीय प्रमाण बनाम भ्रम:कहाँ स्थित हैं ज्येष्ठ विनायक?
आजकल काशी के कुछ प्राचीन तीर्थों को लेकर श्रद्धालुओं में भ्रम फैलाने का प्रयास किया जाता है, जिसका खंडन काशीखण्ड के अकाट्य शास्त्रीय प्रमाण करते हैं। काशीखण्ड के श्लोक १०३ में भगवान शिव स्वयं ज्येष्ठ विनायक की सटीक दिशा बताते हैं:
स्थितो वह्निदिशो भगे चिन्तामणिविनायकात्।।१०३
शास्त्रों के अनुसार, श्री ज्येष्ठ विनायक, ईश्वरगंगी स्थित पौराणिक ‘चिंतामणि गणेश’ के अग्निकोण (दक्षिण-पूर्व दिशा) में प्रतिष्ठित हैं।
मंदिर का प्रामाणिक पता
यदि आप काशी यात्रा पर आ रहे हैं और ५६ विनायक यात्रा के अंतर्गत पाँचवें आवरण के इस महाशक्तिशाली विनायक का दर्शन करना चाहते हैं, तो इनका प्रामाणिक पता नोट कर लें:
स्थान: श्री ज्येष्ठ विनायक (ज्येष्ठेश्वर महादेव मंदिर परिसर)
क्षेत्र: कर्णघंटा (घंटाकर्ण), काशीपुरा, वाराणसी।
काशीपुरा के कर्णघंटा में स्थित ज्येष्ठ विनायक का यह मंदिर न केवल वास्तुकला और प्राचीनता का बेजोड़ नमूना है, बल्कि यह भक्तों की सोई हुई किस्मत को जगाने वाला जाग्रत सिद्धपीठ है। अगली बार जब आप बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी आएं, तो विघ्नहर्ता के इस ‘ज्येष्ठ’ स्वरूप का दर्शन कर अपनी यात्रा को सफल बनाना न भूले।
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