प्रेरक कथा : शनिदेव भी जिनके क्रोध से कांप उठे! जानिए अनाथ बालक के ‘महर्षि पिप्पलाद’ बनने और शनि के ‘शनैश्चर’ होने की अनसुनी कथा
पीपल के कोटर से ‘पिप्पलाद’ बनने तक का सफर
कथा के अनुसार, जब महर्षि दधीचि ने धर्म की रक्षा के लिए अपनी अस्थियों का दान कर दिया, तो उनकी पत्नी वियोग सहन नहीं कर सकीं। उन्होंने अपने 3 वर्षीय बालक को एक विशाल पीपल के वृक्ष के कोटर (खोखले भाग) में सुरक्षित रख दिया और स्वयं पति के साथ सती हो गईं।
वह बालक वर्षों तक पीपल के फल (गोदों) और पत्ते खाकर जीवित रहा। जब देवर्षि नारद ने उस बालक को देखा, तो उसे उसके माता-पिता और उनके साथ हुई नियति के बारे में बताया। नारद मुनि ने ही पीपल के आहार पर जीवित रहने के कारण बालक का नाम ‘पिप्पलाद’ रखा।
जब ब्रह्मा जी से पिप्पलाद ने मांगा विनाशकारी वरदान
अपने पिता की अल्पायु मृत्यु और स्वयं के कष्टों का कारण शनि की महादशा जानकर पिप्पलाद क्रोधित हो उठे। उन्होंने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की और वरदान स्वरूप ऐसी दृष्टि प्राप्त की, जिससे वे किसी को भी भस्म कर सकें। पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि से शनि देव को जलाना शुरू कर दिया। ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया और स्वयं सूर्य देव ने ब्रह्मा जी से अपने पुत्र की रक्षा की गुहार लगाई।
ब्रह्मा जी का हस्तक्षेप और पिप्पलाद के दो ऐतिहासिक वरदान
ब्रह्मा जी के समझाने पर पिप्पलाद शांत हुए, लेकिन उन्होंने शनि देव को छोड़ने के बदले दो महत्वपूर्ण वरदान मांगे, जो आज भी ज्योतिष शास्त्र का आधार हैं:
बाल्यावस्था की सुरक्षा: जन्म से 5 वर्ष तक की आयु तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का दोष नहीं लगेगा, ताकि कोई अन्य बालक पिप्पलाद की तरह अनाथ न हो।
पीपल की शरण: चूँकि पीपल के वृक्ष ने पिप्पलाद को शरण दी थी, अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय से पूर्व पीपल के वृक्ष को जल अर्पित करेगा, उस पर शनि की महादशा का दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा।
शनि देव क्यों कहलाए ‘शनैश्चर’?
पिप्पलाद ने शनि देव को मुक्त तो कर दिया, लेकिन जाते-जाते अपने ब्रह्मदंड से उनके पैरों पर प्रहार किया। इस कारण शनि देव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और उनकी गति धीमी हो गई। इसी कारण वे ‘शनैश्चर’ (धीरे चलने वाले) कहलाए और अग्नि में जलने के कारण उनका रंग श्याम (काला) हो गया।
ज्ञान का भंडार: आगे चलकर इन्हीं महर्षि पिप्पलाद ने ‘प्रश्न उपनिषद’ की रचना की, जो आज भी भारतीय दर्शन और ज्ञान का अनमोल कोष माना जाता है।
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