जानिये चार दिवसीय महा पर्व डाला छठ में किस दिन क्या होता है

छठ पूजा को प्रतिहार, डाला छठ, छठि और सूर्य षष्ठी के रूप में भी जाना जाता है। मुख्य रूप से यह पर्व सूर्य देव की उपासना के लिए मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि यह व्रत करने से सूर्य देव की कृपा पूरे परिवारजनों को प्राप्त होती है। यह व्रत संतान के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए भी किया जाता है।
सूर्य देव को समर्पित चार दिवसीय हिंदू त्योहार आज से शुरू हो चुका है। देश के कई हिस्सों से इस पर्व को बहुत धूमधाम से मनाते हैं, व्रत उपवास करते हैं और नदी या जलाशय में डुबकी लगाकर सूर्य देव की प्रार्थना करते हैं। छठ पूजा की इस अवधि के दौरान भक्त, सूर्य देवता को अर्ध्य देते हैं और श्रद्धा भाव से सूर्य देव की पूजा करते हैं। पूरे देश में छठ पूजा के चार दिवसीय उत्सव की अवधि के दौरान अनुष्ठान किए जाते हैं।
डाला छठ व्रत मुहूर्त : जानिए चार दिवसीय महा व्रत का मुहूर्त और किस दिन क्या होता है
प्रथम दिन –
नहाय खाय 28 अक्टूबर, शुक्रवार को
छठ पूजा का पहला दिन नहाय खाय के रूप में जाना जाता है। इस दिन पूरा परिवार एक पारंपरिक भोजन तैयार करता है और दोपहर में इसे भोग के रूप में परोसता है। जो सेन्धा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में होता है। इस तैयार भोजन को परिवार के सभी लोग मिल-जुलकर ग्रहण करते हैं। इस दिन घर की साफ सफाई करके छठ के व्रती स्नान करके पवित्र तरीके से शाकाहारी भोजन तैयार करते और उसे खाते हैं।
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द्वितीय दिन –
खरना 29 अक्टूबर, शनिवार
छठ पूजा के दूसरे दिन, खरना में महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं। ये व्रत सूर्योदय से शुरू हो जाता है और सूर्यास्त तक चलता है। छठ व्रती सूर्य की पूजा करने के बाद ही शाम को अपना उपवास तोड़ते हैं। व्रती दिनभर अन्न-जल त्याग कर शाम करीब ७ बजे से खीर बनाकर, पूजा करने के उपरान्त प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसे खरना कहते हैं , जिसे परिवारजनों को खिलाते हैं।
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तीसरा दिन –
सूर्यदेव को प्रथम अर्घ – 30 अक्टूबर, रविवार को सायंकाल अस्ताचल (अस्त होते हुए)
इस त्योहार के सबसे महत्वपूर्ण दिन के रूप में मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं एक दिन का उपवास रखती हैं और अगले दिन सूर्योदय के बाद ही इसे तोड़ती हैं। इस पूरे दिन घर में रौनक होती है। व्रत रखने वाले दिन-भर डलिया और सूप में कई प्रकार के फल, ठेकुआ, चावल का लड्डू आदि लेकर संध्या काल में बहते हुए पानी जैसे तालाब, नदी में खड़े होकर सूर्य की पूजा करते हैं और परिवार के सभी सदस्य मिलकर सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं।
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चौथे दिन –
31 अक्टूबर, सोमवार को प्रात:काल उगते हुए सूर्यदेव को द्वितीय अर्घ देकर छठ व्रत का पारण
पर्व चौथे और अंतिम दिन समाप्त होता है जब भक्त उषा अर्घ्य यानी उगते हुए उगते सूरज की प्रार्थना करते हैं। उषा सूर्य देव की पत्नी हैं। लोग सूर्योदय के समय पूजा करते हैं और फिर अपना उपवास तोड़ते हैं। छठ व्रती को सूर्य उगने के पहले ही फिर से उसी तालाब, नहर, नदी पर जाना होता है जहां वे तीसरे दिन गए थे। इस दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए भगवान सूर्य से प्रार्थना की जाती है। परिवार के अन्य सदस्य भी व्रती के साथ सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं।
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