विशेष : तांत्रिक बाधाओं से मुक्ति का उपाय.. करें ‘दुर्गा पंजर स्तोत्र’ की अमोघ साधना,
उज्जैन/काशी: शक्ति की उपासना का महापर्व नवरात्रि आज से हर्षोल्लास के साथ शुरू हो गया है। ज्योतिषाचार्यों और तंत्र शास्त्र के जानकारों के अनुसार, यह समय सोई हुई शक्तियों को जगाने और कुल की रक्षा के लिए सर्वश्रेष्ठ है। इस पावन अवसर पर ‘दुर्गा पंजर स्तोत्र’ की साधना को लेकर भक्तों में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। मान्यता है कि यह स्तोत्र न केवल साधक की रक्षा करता है, बल्कि बंधनों में फंसी ‘कुलदेवी’ को भी मुक्त कराने की शक्ति रखता है।
क्या है दुर्गा पंजर स्तोत्र?
मार्कण्डेय पुराण के देवीमहात्म्य (रुद्रयामल तंत्र) से उद्धृत यह स्तोत्र माँ दुर्गा का एक अभेद्य ‘कवच’ माना जाता है। जानकारों का कहना है कि इसके नियमित पाठ से साधक के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा निर्मित हो जाता है, जिसे भेद पाना नकारात्मक शक्तियों के लिए असंभव है।
कुलदेवी की कृपा और तांत्रिक बाधाओं से मुक्ति
इस स्तोत्र की सबसे विलक्षण विशेषता इसका कुलदेवी से संबंध है। आध्यात्मिक विशेषज्ञों के अनुसार:
यदि किसी परिवार की कुलदेवी किसी तांत्रिक बंधन के कारण रुष्ट या शांत हैं, तो इस पाठ से वे बंधन मुक्त होकर परिवार की सहायता करने लगती हैं।
नियमित पाठकर्ता के साथ स्वयं कुलशक्ति अंग-संग चलने लगती है।
यह स्तोत्र शत्रुओं के दमन, दुःस्वप्न से मुक्ति और यात्रा में सुरक्षा के लिए अचूक है।
साधना विधि:
यदि आप भी इस नवरात्रि माँ दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो निम्नलिखित विधि का पालन कर सकते हैं:
संकल्प और आसन: लाल या पीले वस्त्र धारण कर उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठें। साधना से पूर्व अपना नाम और गोत्र बोलकर रक्षा व कुलदेवी की कृपा हेतु संकल्प लें।
पाठ संख्या: नवरात्रि के 9 दिनों तक प्रतिदिन 21 पाठ करना सर्वोत्तम माना गया है (न्यूनतम 1, 3, 5, 7, 9 या 11 भी कर सकते हैं)।
पुष्प अर्पण: प्रत्येक पाठ की समाप्ति पर माँ को एक अपराजिता या गुड़हल का फूल अर्पित करें। 9 दिनों में कुल 189 फूलों का अर्पण विशेष फलदायी है।
सात्विकता: साधना काल में मौन रहने का प्रयास करें और केवल सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।
॥ श्रीदुर्गा पञ्जरस्तोत्रम् ॥
विनियोगः –
ॐ अस्य श्रीदुर्गा पञ्जरस्तोत्रस्य सूर्य ऋषिः, त्रिष्टुप्छन्दः, छाया देवता, श्रीदुर्गा पञ्जरस्तोत्र पाठे विनियोगः ।
ध्यानम् –
ॐ हेमप्रख्यामिन्दुखण्डात्तमौलिं शङ्खाभीष्टाभीतिहस्तां त्रिनेत्राम् ।
हेमाब्जस्थां पीनवस्त्रां प्रसन्नां देवीं दुर्गां दिव्यरूपां नमामि ॥
भावार्थ : सुवर्ण के समान आभायुक्त, सिर पर चन्द्रमा के खण्ड को धारण करने वाली, शंख, अभीष्ट वर और अभयमुद्रा को हाथों में धारण करने वाली, तीन नेत्रों वाली, सुवर्ण कमल पर विराजमान, पीताम्बर धारण करने वाली, प्रसन्न मुख वाली, दिव्य स्वरूपा माँ दुर्गा को नमन।
अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत् ।
यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रह्मादयः सुराः ॥
भावार्थ : सैकड़ों अपराध करने के बाद भी यदि कोई “जगदम्बे” कहकर पुकारता है, उसे जो गति प्राप्त होती है, वह ब्रह्मा आदि देवताओं को भी नहीं मिलती।
सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके ॥
भावार्थ : हे जगदम्बिके! मैं अपराधी हूँ, आपकी शरण में आया हूँ।
मार्कण्डेय उवाच –
श्लोक १
दुर्गे दुर्गप्रदेशेषु दुर्वाररिपुमर्दिनी ।
मर्दयित्री रिपुश्रीणां रक्षां कुरु नमोऽस्तुते ॥
भावार्थ : हे दुर्गे! दुर्गम प्रदेशों में रहने वाली, दुर्जेय शत्रुओं का मर्दन करने वाली, शत्रुओं की श्री (सम्पत्ति) का मर्दन करने वाली देवी! मेरी रक्षा करें, आपको नमन है।
श्लोक २
पथि देवालये दुर्गे अरण्ये पर्वते जले ।
सर्वत्रोपगते दुर्गे दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥
भावार्थ : मार्ग में, देवालय में, दुर्गम स्थानों में, जंगल में, पर्वत पर, जल में, सर्वत्र व्याप्त रहने वाली हे दुर्गे! रक्षा करें, आपको नमन है।
श्लोक ३
दुःस्वप्ने दर्शने घोरे घोरे निष्पन्नबन्धने ।
महोत्पाते च नरके दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥
भावार्थ : दुःस्वप्न में, भयानक दर्शन में, भयंकर बन्धन में फँसने पर, महान उत्पातों में और नरक में हे दुर्गे! रक्षा करें, आपको नमन है।
श्लोक ४
व्याघ्रोरगवराहादिजन्तुसङ्कटे ।
ब्रह्मविष्णुस्तुते दुर्गे दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥
भावार्थ : बाघ, सर्प, सूअर आदि जन्तुओं के संकट में, ब्रह्मा और विष्णु द्वारा स्तुत हे दुर्गे! रक्षा करें, आपको नमन है।
श्लोक ५
खेचरा मातरः सर्वं भूचराश्चातिरोहिताः ।
ये त्वां समाश्रितास्तांस्त्वं दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥
भावार्थ : आकाश में विचरण करने वाली मातृशक्तियाँ और भूमि पर विचरण करने वाली अतिरोहित शक्तियाँ – जो भी आपकी शरण लेते हैं, हे दुर्गे! उनकी रक्षा करें, आपको नमन है।
श्लोक ६
कंसासुरपुरे घोरे कृष्णरक्षणकारिणी ।
रक्ष रक्ष सदा दुर्गे दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥
भावार्थ : कंसासुर के भयानक नगर में श्रीकृष्ण की रक्षा करने वाली हे दुर्गे! सदा मेरी रक्षा करें, आपको नमन है।
श्लोक ७
अनिरुद्धस्य रुद्धस्य दुर्गे बाणपुरे पुरा ।
वरदे त्वं महाघोरे दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥
भावार्थ : प्राचीन काल में बाणासुर के नगर में रुद्ध (बन्दी) हुए अनिरुद्ध को, हे वरदायिनी, महाघोर रूपा दुर्गे! रक्षा करें, आपको नमन है।
श्लोक ८
देवद्वारे नदीतीरे राजद्वारे च सङ्कटे ।
पर्वतारोहणे दुर्गे दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥
भावार्थ : देवालय के द्वार पर, नदी के तट पर, राजद्वार पर, संकट में, पर्वत पर चढ़ने के समय हे दुर्गे! रक्षा करें, आपको नमन है।
श्लोक ९
दुर्गापञ्जरमेतत्तु दुर्गासारसमाहितम् ।
पठन्स्तारयेद् दुर्गा नात्र कार्या विचारणा ॥
भावार्थ : यह दुर्गा पंजर स्तोत्र दुर्गा के सार से परिपूर्ण है। इसे पढ़ने वाले की माँ दुर्गा रक्षा करती हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है।
श्लोक १०
रुद्रबाला महादेवी क्षमा च परमेश्वरी ।
अनन्ता विजया नित्या मातस्त्वमपराजिता ॥
भावार्थ : हे रुद्रबाला, महादेवी, क्षमा, परमेश्वरी, अनन्ता, विजया, नित्या, माता, आप अपराजिता हैं।
॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे देवीमहात्म्ये रुद्रयामले देव्याः पञ्जरस्तोत्रम् ॥
स्तोत्र के अद्भुत लाभ
सर्वांगीण सुरक्षा – यह स्तोत्र साधक के चारों ओर सुरक्षा कवच का निर्माण करता है।
शत्रुओं से रक्षा – शत्रुओं का मर्दन करने वाली माँ दुर्गा भक्त की सभी शत्रुओं से रक्षा करती हैं।
दुर्गम स्थानों में सुरक्षा – जंगल, पर्वत, जल, मरुस्थल आदि दुर्गम स्थानों में यह स्तोत्र रक्षा करता है।
दुःस्वप्न से मुक्ति – बुरे सपने और भयानक दृश्यों से मुक्ति मिलती है।
बन्धन से मुक्ति – किसी भी प्रकार के बन्धन (शारीरिक, मानसिक, आर्थिक) से मुक्ति मिलती है।
वन्य प्राणियों से रक्षा – जंगली जानवरों और सर्प आदि से रक्षा होती है।
यात्रा में सुरक्षा – यात्रा के दौरान यह स्तोत्र अत्यंत रक्षात्मक होता है।
संकट निवारण – जीवन के हर संकट में यह स्तोत्र सहायक होता है।
कुलदेवी का साथ – इस स्तोत्र के पाठ से कुलदेवी साथ चलने लगती हैं।
तांत्रिक बंधन से मुक्ति – यदि कुलदेवी किसी तांत्रिक बंधन में हैं तो वह भी छूट जाता है।
साधना काल
दिन – नवरात्रि श्रेष्ठ
समय – प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में या संध्या काल में
आसन – लाल रंग का आसन बिछाएं
वस्त्र – लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र पहनें
दिशा – उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठें
संख्या – नित्य 21 पाठ (9 दिनों तक)
विशेष बातें –
प्रत्येक पाठ के बाद माँ भगवती को एक अपराजिता का फूल या गुड़हल का फूल समर्पित करें
इस प्रकार 21 पाठ × 9 दिन = कुल 189 फूल अर्पित करें
साधना प्रारंभ करने से पूर्व संकल्प अवश्य लें
संकल्प में अपना नाम, गोत्र और साधना का उद्देश्य (सुरक्षा, कुलदेवी की कृपा या कोई विशेष कामना) बोलें
साधना काल में सात्विक भोजन करें
ध्यान और साधना के दौरान विशेष बातें
साधना के दौरान माँ दुर्गा के स्वरूप का ध्यान करें
मन को एकाग्र करने का प्रयास करें
फूल अर्पित करते समय माँ से अपनी रक्षा और कुलदेवी की कृपा की प्रार्थना करें
साधना काल में यथासंभव मौन रहें
नकारात्मक विचारों और वार्तालाप से बचें
भोजन में सात्विकता का ध्यान रखें
समापन पर कन्या पूजन का महत्व
साधना की पूर्णता अष्टमी या नवमी तिथि को 9 कन्याओं के पूजन से होती है। कन्याओं को साक्षात माँ दुर्गा का स्वरूप मानकर उन्हें भोजन कराएं, दक्षिणा दें और उनका आशीर्वाद लें।
शंका समाधान
1: क्या यह स्तोत्र केवल नवरात्रि में ही पढ़ना चाहिए?
उत्तर: यह स्तोत्र किसी भी समय पढ़ा जा सकता है, लेकिन नवरात्रि में इसका विशेष महत्व है। नवरात्रि के 9 दिन इसकी साधना करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
2: क्या इस स्तोत्र से सच में कुलदेवी साथ चलने लगती हैं?
उत्तर: हाँ, इसमें माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों का वर्णन है। जब आप नियमित रूप से इसका पाठ करते हैं, तो आपकी कुलदेवी स्वयं आपके साथ चलने लगती हैं और आपके परिवार का सहयोग करती हैं।
3: अगर कुलदेवी तांत्रिक बंधन में हों तो क्या होगा?
उत्तर: इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यदि किसी कारणवश आपकी कुलदेवी किसी तांत्रिक बंधन में हैं, तो इस स्तोत्र के प्रभाव से वह बंधन भी छूट जाता है और कुलदेवी मुक्त होकर आपके परिवार की रक्षा करने लगती हैं।
4: क्या मैं 21 से कम पाठ कर सकता हूँ?
उत्तर: हाँ, आप अपनी सुविधा अनुसार 1, 3, 5, 7, 9 या 11 पाठ भी कर सकते हैं। जितना संभव हो, नियमित रूप से करें। 21 पाठ उत्तम माने गए हैं।
5: क्या अपराजिता या गुड़हल का फूल न मिले तो क्या करें?
उत्तर: यदि ये फूल उपलब्ध न हों, तो कोई भी लाल या गुलाबी रंग का फूल अर्पित कर सकते हैं। भावना प्रधान है, फूल गौण।
विशेष संदेश:
“सैकड़ों अपराध करने के बाद भी यदि कोई ‘जगदम्बे’ कहकर पुकारता है, तो उसे वह गति प्राप्त होती है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।”
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