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SUMMARY:साल का पहला सूर्य ग्रहण\, राशियों पर होगा ये प्रभाव
DESCRIPTION:इस साल का पहला सूर्य ग्रहण अप्रैल के महीने में पड़ेगा और इस ग्रहण के मिले-जुले प्रभाव सभी राशियों को देखने को मिलेंगे। आइए जानें आपकी राशि में इस सूर्य…\nसूर्य ग्रहण एक ऐसी खगोलीय घटना होती है जिसमें सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्रमा आ जाता है और उस समय चन्द्रमा के पीछे सूर्य का प्रतिबिंब कुछ समय के लिए पूरी तरह से ढक जाता है। विज्ञान में इस घटना को ही सूर्यग्रहण कहा जाता है। \nयदि ज्योतिष की मानें तो सूर्य ग्रहण राशियों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। हर एक ग्रहण का सभी राशियों में कुछ न कुछ प्रभाव जरूर होता है और इनके प्रभाव से राशियों को कुछ लाभ भी होता है। \nवहीं कुछ राशियों पर सूर्य ग्रहण का नकारात्मक प्रभाव भी हो सकता है। सूर्य ग्रहण के दौरान पृथ्वी और सूर्य के बीच में चांद के आ जाने से पृथ्वी पर रोशनी ठीक से नहीं पड़ पाती है और कुछ समय के लिए पृथ्वी अन्धकार में डूब जाती है। \nइस साल का पहला सूर्यग्रहण अप्रैल के महीने में पड़ने वाला है। सूर्य ग्रहण मुख्य रूप से अमावस्या तिथि के दिन पड़ता है।  साल 2023 में पड़ने वाले पहले सूर्य ग्रहण की तिथि और इसके राशियों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में कुछ बातें। \nकब लगेगा साल का पहला सूर्य ग्रहण \nसाल 2023 का पहला सूर्य ग्रहण 20 अप्रैल\, 2023\, बृहस्पतिवार के दिन पड़ेगा। \nसूर्य ग्रहण का समय- 20 अप्रैल\, प्रातः 7 बजकर 4 मिनट से दोपहर 12 बजकर 29 मिनट तक। \nहालांकि इस सूर्य ग्रहण का प्रभाव भारत में नहीं होगा\, लेकिन फिर भी सूतक काल मान्य होगा। \nसूर्य ग्रहण का राशियों पर प्रभाव \nसाल के पहले सूर्य ग्रहण का अलग राशियों पर अलग तरह का प्रभाव पड़ेगा। कुछ राशियों को इसके प्रभाव से धन लाभ मिल सकता है और कुछ की उन्नति संभव है\, वहीँ कुछ विशेष राशियों को नुकसान भी हो सकता है। आइए जानें सूर्यग्रहण के प्रभाव के बारे में। \nमेष राशि \nमेष राशि पर सूर्य ग्रहण के मिले-जुले प्रभाव हो सकते हैं और जहां उन्हें नौकरी में प्रमोशन मिल सकता है\, वहीं उनकी सेहत पर कुछ बुरे प्रभाव पड़ सकते हैं। आपको अपने खान-पान पर ध्यान देने की जरूरत है। \nवृषभ राशि \nवृषभ राशि के लोगों पर सूर्य ग्रहण अनुकूल प्रभाव देगा। इस राशि को धन लाभ मिल सकता है। आप कोई नया व्यापार शुरू कर सकते हैं और नौकरी में भी शुभ योग हैं। \nमिथुन राशि \nमिथुन राशि के लोगों के लिए कुछ बुरे संकेत हैं। सोच-समझकर धन का व्यय जड़ें अन्यथा आपको बड़ा नुक्सान हो सकता है। कुछ समय के लिए पैसा प्रॉपर्टी में न लगाएं। \nकर्क राशि \nआपकी राशि के लिए सूर्य ग्रहण कुछ विशेष प्रभाव लाएगा। इसके प्रभाव से आपको कुछ नए संबंध बनाने में मदद मिलेगी। कुंवारे लोगों के लिए जल्द ही शादी के योग बनेंगे। \nसिंह राशि \nआपके लिए सूर्य ग्रहण का मिला-जुला प्रभाव हो सकता है। आपको करियर (करियर होरोस्कोप 2023) में सफलता मिल सकती है\, लेकिन धन का व्यय नुकसान पहुंचा सकता है। कोई भी निर्णय लेने से पहले बड़ों की सलाह जरूर लें। \nकन्या राशि \nकन्या राशि के लोगों को सूर्य ग्रहण के प्रभाव से परिवार से पूर्ण सहयोग मिलेगा। आपको कोई नयी जिम्मेदारी मिल सकती है जिसका आपको वर्कप्लेस में लाभ होगा। \nतुला राशि \nतुला राशि को थोड़ा सचेत रहने की जरूरत है। होशियारी से कोई भी निर्णय लें और धन का व्यय न करें। आपको धन की कमी भी महसूस हो सकती है। हालांकि कुछ समय बाद समय अनुकूल हो जाएगा। \nवृश्चिक राशि \nआपको सूर्य ग्रहण के प्रभाव से किसी रिश्ते में धोखा मिल सकता है। किसी पर भी आंख मूंदकर विश्वास न करें। सोच समझकर ही आगे बढ़ें। \nधनु राशि \nधनु राशि के लिए सूर्य ग्रहण हर तरह से सकारात्मक है। आपके आने वाले समय में धन के योग बनेंगे। कोई नई नौकरी से लाभ होगा और प्रेम में भी सफलता के योग हैं। \nमकर राशि \nमकर राशि के लोगों के लिए समय उत्तम है। आपके बिगड़े काम भी बनेंगे और आपको नौकरी में प्रमोशन मिल सकता है। वर्कप्लेस में सीनियर्स का सहयोग आपको आगे बढ़ाएगा। \nकुंभ राशि \nकुंभ राशि के लिए समय कुछ उतार-चढ़ाव लाएगा। आपका नया व्यापार आपको लाभ दिलाएगा\, लेकिन किसी बाहरी पर विश्वास न करें क्योंकि आपको विश्वासघात मिल सकता है। \nमीन राशि \nमीन राशि के लोगों के लिए साल का पहला सूर्यग्रहण ऊर्जा का संचार करेगा। आपको धन लाभ मिल सकता है और पुरानी योजनाएं सफल हो सकती हैं। \nसभी राशियों के लिए सूर्य ग्रहण के मिले-जुले प्रभाव मिलेंगे। किसी भी समस्या से घबराएं नहीं और समाधान के बारे में विचार करें। \n\n \n\n\n\n\n इन्हें भी पढ़िए..  \nराष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया देवाधिदेव महादेव श्री काशी विश्वनाथ एवं काशी के कोतवाल काल भैरव का दर्शन पूजन \nपौराणिक कथा : भगवान शिव का नाम त्रिपुरारी कैसे पड़ा \nइस स्थान पर होती है शिवलिंग की रात में पूजा\, जानें इसकी वजह \nकिनको और क्यों रखना चाहिए शिखा या चोटी\, मिलता हैं ये लाभ… \nभगवान विष्णु\, राम और कृष्ण की तरह क्यों नहीं लगता महादेव के आगे ‘श्री’ \n\nदैनिक पंचांग / राशिफल  \nजिनका आज जन्मदिन है 14 फरवरी \nआज का राशिफल 14 फरवरी  2023 मंगलवार \nआज का पंचांग 14 फरवरी  2023 मंगलवार \nसाप्ताहिक राशिफल 13 -19 फरवरी : जानिए ग्रहों के चाल से कैसा रहेगा यह सप्ताह \nजिनका आज जन्मदिन है 13 फरवरी\, कुछ ऐसा रहेगा यह वर्ष… \nआज का पंचांग\, 13 फरवरी 2023\, सोमवार \nआज का राशिफल\, 13 फरवरी 2023\, सोमवार \n\nअवश्य पढ़िए..  \nजानें शिवरात्रि और महाशिवरात्रि में क्या है अंतर \nइस साल 7 या 8 मार्च\, किस दिन खेली जाएगी होली? जानें होलिका दहन का सही मुहूर्त \nजानिए क्या है फाल्गुन मास का धार्मिक महत्व\, किनका करें पूजा… \nये हैं आज से शुरू हुए हिंदी कैलेंडर के अंतिम मास फागुन की ख़ास बातें \nआज से शुरू हो रहा है फाल्गुन माह\, जानें महत्त्व\, नियम और पूजा विधि \nयदि हैं आज कोर्ट कचहरी के चक्कर से परेशान\, राहत के लिए आजमाये ये उपाय \nछिड़कें दो चुटकी नमक\, मिलेगा जोरदार तरक्की आपको अपने करियर में \nशनि देव को शांत करने के पाँच प्रयोग\, पढ़िए ब्रह्म पुराण’ में क्या कहते है शनिदेव \nकुछ ऐसा रहेगा आपका फरवरी में ग्रह चाल \, जानिए अपने राशि का हाल \nजानिए\, फरवरी में ये हैं शादी के मूहूर्त\, कब कर सकते हैं गृहप्रवेश\, मुंडन\, साथ ही पंचक का मतलब और कब है पंचक ? \nये है फरवरी माह के व्रत\, त्योहार और छुट्टी की लिस्ट\, जानिए कब है महाशिवरात्रि ? \n\nपौराणिक कथाएं   \nआखिर क्यों अपने ही बेटे के हाथों मारे गए थे अर्जुन \nपत्थर रूप में ही क्यों शिंगणापुर में प्रकट हुए शनि पढ़िए पुरी कहानी \n\nउम्मीद है कि आपको यह लेख पसंद आया होगा। अन्य लेख पढ़ने के लिए साथ ही अपनी सुझाव संग पसंद – नापसंद जरूर बताएं। साथ ही जुड़ें रहें हमारी वेबसाइट ” मोक्ष भूमि – काशी “ के साथ। हमारी टीम को आपके प्रतिक्रिया का इन्तजार है। 9889881111 \n\n \n\nडिसक्लेमर \nइस लेख में दी गई जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता को जाँच लें । सूचना के विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/ प्रवचनों /धार्मिक मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संकलित करके यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। जानकारी पूरी सावधानी से दी जाती हैं फिर भी आप पुरोहित से स्पस्ट कर लें।
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SUMMARY:देवउठनी एकादशी 2022 तिथि का आरंभ 3 नवंबर\, दिन गुरूवार को शाम के 7 बजकर 30 मिनट से हो रहा है।
DESCRIPTION:देवउठनी एकादशी 2022 – इसलिए होता है ये ख़ास दिन \, जानिये तुलसी विवाह मुहूर्त और महत्त्व\n  \nकार्तिक माह के शुक्ल पक्ष में देवउठनी एकादशी मनाई जाती है। इस साल देवउठनी एकादशी 4 नवंबर\, दिन शुक्रवार को पड़ रही है। इस एकादशी को देवोत्थान एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाता जाना है। देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह कराने की भी परंपरा है। \nहिन्दू धर्म के अनुसार\, देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की चार माह के शयन के बाद निद्रा पूर्ण हो जाती है और वह पाताल से अपने धाम वैकुण्ठ पुनः लौटते हैं। देवउठनी एकादशी से ही भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी का पूजन दोबारा एक साथ शुरू होता है और इसी कारण से देवउठनी एकादशी के साथ ही सभी मांगलिक कार्य होने लगते हैं। \n देवउठनी एकादशी मुहूर्त\nदेवउठनी एकादशी 4 नवंबर\, दिन शुक्रवार को पड़ रही है लेकिन तिथि का आरंभ 3 नवंबर\, दिन गुरूवार को शाम के 7 बजकर 30 मिनट से हो रहा है। वहीं\, तिथि का समापन अगले दिन 4 नवंबर को शाम 6 बजकर 8 मिनट पर होगा। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार\, एकादशी का व्रत 4 नवंबर को ही रखा जाएगा। इसके अलावा\, व्रत पारण समय की बात करें तो आप 5 नवंबर को सुबह 8 बजकर 52 मिनट तक पारण कर सकते हैं। \nदेवउठनी एकादशी महत्व\nदेवउठनी एकादशी के दिन दान-पुण्य करने से व्यक्ति के घर में शुभता का आगमन होता है। इस दिन तुलसी विवाह (तुलसी विवाह की तिथि) का बहुत अधिक महत्व बताया गया है। देवउठनी एकादशी से ही सभी देवी देवताओं की पूजा शुरू हो जाती है। इसके साथ ही माना जाता है कि इस एकादशी के बाद से न केवल विवाह सम्बंधित बल्कि गृह प्रवेश\, मुंडन व अन्य मांगलिक कार्यों का भी आरंभ होता है। देवउठनी एकादशी को महत्वपूर्ण इसलिए भी माना जाता है क्योंकि यह मार्तुक माह के मध्य में पड़ती है। मान्यताओं के अनुसार\, इस एकादशी पर रखे गए व्रत और भगवान विष्णु एवं मां लक्ष्मी की पूजा का दोगुना फल मिलता है। व्रती की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और उसके किसी भी कार्य में कभी कोई अड़चन नहीं आती। \n\nइन्हें भी पढ़िए..\nयदि आपके दाम्पत्य जीवन में है कुछ खटास तो करें ये उपाय\, होगा सुखी वैवाहिक जीवन \nचन्द्रग्रहण : आपके राशि पर क्या पड़ेगा ग्रहण का प्रभाव \nगोपाष्टमी : कब शुरू हुआ गौ पूजन\, जानिए गाय के शरीर में है किन किन देवता का हैं निवास \nगोपाष्टमी पर्व :आइए जानते हैं गोपाष्टमी पर्व का महत्व\, कथा\, पूजा विधि तथा इस दिन करने वाले महा उपाय\, जिससे जीवन भर रहेगी घर में धन\, वैभव\,और संपदा \nडाला छठ : आखिर क्यों नहीं पहनते सिलाई किए हुए कपड़े \nजानिए छठ पूजा पर सूर्य को अर्घ्य क्यों दिया जाता है? \nडाला छठ : इसलिए लगाया जाता है नाक से सिंदूर \nछठ पूजा – क्या है “कोसी भराई”\, क्या महत्त्व और विधि है  “कोसी सेवना” का \nछठ महापर्व : ठेकुआ के साथ और क्या चढ़ता है प्रसाद \nजानिये कौन हैं छठ व्रत में पूजित छठी मैया \n\nउम्मीद है कि आपको यह लेख पसंद आया होगा।  अन्य लेख पढ़ने के लिए साथ ही अपनी पसंद – नापसंद जरूर बताएं। .   और जुड़ें रहें हमारी वेबसाइट  ” मोक्ष भूमि – काशी ”  के साथ।  .     हमारी टीम को आपके प्रतिक्रिया का इन्तजार है।9889881111 \n\nखबरों के लिए क्लिक करें –  https://innovest.co.in \n\nयदि आप सनातनी है तो काशी की नष्ट हो रही ऊर्जा को बचाने के लिए अभियान में आप के साथ की जरूरत है। कृपया सम्पर्क करें… 9889881111\, 8765000123
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SUMMARY:अक्षय \,आँवला या कुष्माण्ड नवमी
DESCRIPTION:अक्षय नवमी : 2 नवम्बर\, बुधवार को\n॥ अक्षय नवमी पर भगवान श्रीहरि की पूजा से मिलेगी सुख-समृद्धि\, खुशहाली\n॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मन्त्र से होंगे भगवान श्रीविष्णु प्रसन्न\n॥ आँवले के वृक्ष के नीचे होगा पूजनोपरान्त भोजन\n॥ अक्षय नवमी व्रत से होगी मनोकामना पूर्ण \nभारतीय संस्कृति के सनातन धर्म में अक्षय पुण्य फल की कामना के संग मनाया जाने वाला पर्व अक्षय नवमी कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन हर्ष\, उमंग एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। अक्षय नवमी को आँवला नवमी या कुष्माण्ड नवमी के नाम से भी जाना जाता है। अक्षय नवमी जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि इस दिन किए गए पुण्य और पाप\, शुभ-अशुभ समस्त कार्यों का फल अक्षय (स्थायी) हो जाता है। तीन वर्ष तक लगातार अक्षय नवमी का व्रत-उपवास एवं पूजा करने से अभीष्ट की प्राप्ति बतलाई गई है।\nइस बार यह पर्व 2 नवम्बर\, बुधवार को मनाया जायेगा। कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 01 नवम्बर\, मंगलवार को रात्रि 11 बजकर 05 मिनट पर लगेगी\, जो कि अगले दिन 2 नवम्बर\, बुधवार को रात्रि 9 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। अक्षय नवमी का व्रत 2 नवम्बर\, बुधवार को रखा जायेगा। अक्षय नवमी के दिन व्रत रखकर भगवान श्रीलक्ष्मीनारायण-श्रीविष्णु की पूजा अर्चना तथा आँवले के वृक्ष के समीप या नीचे बैठकर भोजन करने की पौराणिक व धार्मिक मान्यता है। पूजा करने वाले का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। व्रतकर्ता को अपने दैनिक नित्य कृत्यों से निवृत्त होकर स्नान ध्यान के पश्चात् स्वच्छ वस्त्र पहनकर अक्षय नवमी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। भगवान श्रीलक्ष्मीनारायण की पंचोपचार\, दशोपचार या षोडशोपचार पूजा की जाती है। आज के दिन भगवान श्रीविष्णु का प्रिय मंत्र ‘‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’’ का जप अधिकतम संख्या में करने पर भगवान शीघ्र प्रसन्न होकर भक्त को उसकी मनोकामना पूर्ति का वरदान देते हैं। \nअक्षय नवमी पर पूजा का विधान \nपौराणिक मान्यता के अनुसार इस पर्व पर आँवले के वृक्ष की पूजा से अक्षय फल (कभी न खत्म होनेवाले पुण्यफल) की प्राप्ति होती है। साथ ही सौभाग्य में अभिवृद्धि होती है। इस पर्व पर आँवले के वृक्ष की पूजा पुष्प\, धूप\, दीप\, नैवेद्य आदि से की जाती है। पूजन करने के पश्चात् वृक्ष की आरती करके परिक्रमा करनी चाहिए। कुष्माण्ड (कोहड़ा) का दान भी किया जाता है\, जिसमें अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोना\, चाँदी व नगद द्रव्य रखकर भूदेव कर्मनिष्ठ ब्राह्मïण को दान देने से पुण्यफल की प्राप्ति होती है। आँवले के वृक्ष के समीप या नीचे ब्राह्मण को सात्विक भोजन कराकर दान-दक्षिणा देकर पुण्य अर्जित करना चाहिए। इसके अलावा अन्न\, घी एवं अन्य जरूरी वस्तुओं का दान देना भी अक्षय फल की प्राप्ति कराता है। आज के दिन गोदान करने की विशेष महिमा है। \nधार्मिक-पौराणिक मान्यता \nअक्षय नवमी के दिन किए गए दान से जीवन में जाने-अनजाने में हुए समस्त पापों का शमन हो जाता है। इस दिन पितृलोक में विराजित पितरों को शीत (ठण्ड) से बचाने के लिए संकल्प करके भूदेव (ब्राह्मण) को ऊनी वस्त्र\, कम्बल देने की शास्त्रीय मान्यता है। आँवले के पूजन के लिए यदि आँवले का वृक्ष उपलब्ध न हो तो मिट्टी के नए गमले में आँवले का पौधा लगाकर उसकी विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना करनी चाहिए जिससे जीवन में कल्याण होता रहे। आँवले के पूजन से सुहागिन महिलाओं का सौभाग्य अखण्ड रहता है। आँवले के वृक्ष के पूजन से सन्तान की प्राप्ति भी बतलाई गई है। \nव्रतकर्ता के लिए विशेष \nआँवला नवमी पर्व पर तन-मन-धन से पूर्णतया शुचिता के साथ व्रत आदि करना चाहिए। यदि तीन वर्ष तक लगातार व्रत करें तो मनोकामना की पूर्ति के साथ अभीष्ट की प्राप्ति भी होती है। व्रतकर्ता को दिन में शयन नहीं करना चाहिए। दूसरे का अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। व्यर्थ की वार्तालाप से बचना चाहिए। साथ ही मन-वचन-कर्म से शुभ कृत्यों की ओर अग्रसर रहना चाहिए। \n– ज्योतिर्विद् श्री विमल जैन \n\nइन्हें भी पढ़िए..\nयदि आपके दाम्पत्य जीवन में है कुछ खटास तो करें ये उपाय\, होगा सुखी वैवाहिक जीवन\nचन्द्रग्रहण : आपके राशि पर क्या पड़ेगा ग्रहण का प्रभाव\nगोपाष्टमी : कब शुरू हुआ गौ पूजन\, जानिए गाय के शरीर में है किन किन देवता का हैं निवास\nगोपाष्टमी पर्व :आइए जानते हैं गोपाष्टमी पर्व का महत्व\, कथा\, पूजा विधि तथा इस दिन करने वाले महा उपाय\, जिससे जीवन भर रहेगी घर में धन\, वैभव\,और संपदा\nडाला छठ : आखिर क्यों नहीं पहनते सिलाई किए हुए कपड़े\nजानिए छठ पूजा पर सूर्य को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?\nडाला छठ : इसलिए लगाया जाता है नाक से सिंदूर\nछठ पूजा – क्या है “कोसी भराई”\, क्या महत्त्व और विधि है  “कोसी सेवना” का\nछठ महापर्व : ठेकुआ के साथ और क्या चढ़ता है प्रसाद\nजानिये कौन हैं छठ व्रत में पूजित छठी मैया \n\nउम्मीद है कि आपको यह लेख पसंद आया होगा।  अन्य लेख पढ़ने के लिए साथ ही अपनी पसंद – नापसंद जरूर बताएं। .   और जुड़ें रहें हमारी वेबसाइट  ” मोक्ष भूमि – काशी ”  के साथ।  .     हमारी टीम को आपके प्रतिक्रिया का इन्तजार है।9889881111 \n\nखबरों के लिए क्लिक करें –  https://innovest.co.in \n\nयदि आप सनातनी है तो काशी की नष्ट हो रही ऊर्जा को बचाने के लिए अभियान में आप के साथ की जरूरत है। कृपया सम्पर्क करें… 9889881111\, 8765000123
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SUMMARY:अक्षय \,आँवला या कुष्माण्ड नवमी  ;  2 नवम्बर\, बुधवार को करिये आँवले के वृक्ष की पूजाऔर पाइये कभी न खत्म होनेवाले पुण्यफल  
DESCRIPTION:  अक्षय नवमी : 2 नवम्बर\, बुधवार को\n॥ अक्षय नवमी पर भगवान श्रीहरि की पूजा से मिलेगी सुख-समृद्धि\, खुशहाली\n॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मन्त्र से होंगे भगवान श्रीविष्णु प्रसन्न\n॥ आँवले के वृक्ष के नीचे होगा पूजनोपरान्त भोजन\n॥ अक्षय नवमी व्रत से होगी मनोकामना पूर्ण \n भारतीय संस्कृति के सनातन धर्म में अक्षय पुण्य फल की कामना के संग मनाया जाने वाला पर्व अक्षय नवमी कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन हर्ष\, उमंग एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। अक्षय नवमी को आँवला नवमी या कुष्माण्ड नवमी के नाम से भी जाना जाता है। अक्षय नवमी जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि इस दिन किए गए पुण्य और पाप\, शुभ-अशुभ समस्त कार्यों का फल अक्षय (स्थायी) हो जाता है। तीन वर्ष तक लगातार अक्षय नवमी का व्रत-उपवास एवं पूजा करने से अभीष्ट की प्राप्ति बतलाई गई है।\n इस बार यह पर्व 2 नवम्बर\, बुधवार को मनाया जायेगा। कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 01 नवम्बर\, मंगलवार को रात्रि 11 बजकर 05 मिनट पर लगेगी\, जो कि अगले दिन 2 नवम्बर\, बुधवार को रात्रि 9 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। अक्षय नवमी का व्रत 2 नवम्बर\, बुधवार को रखा जायेगा। अक्षय नवमी के दिन व्रत रखकर भगवान श्रीलक्ष्मीनारायण-श्रीविष्णु की पूजा अर्चना तथा आँवले के वृक्ष के समीप या नीचे बैठकर भोजन करने की पौराणिक व धार्मिक मान्यता है। पूजा करने वाले का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। व्रतकर्ता को अपने दैनिक नित्य कृत्यों से निवृत्त होकर स्नान ध्यान के पश्चात् स्वच्छ वस्त्र पहनकर अक्षय नवमी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। भगवान श्रीलक्ष्मीनारायण की पंचोपचार\, दशोपचार या षोडशोपचार पूजा की जाती है। आज के दिन भगवान श्रीविष्णु का प्रिय मंत्र ‘‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’’ का जप अधिकतम संख्या में करने पर भगवान शीघ्र प्रसन्न होकर भक्त को उसकी मनोकामना पूर्ति का वरदान देते हैं। \nअक्षय नवमी पर पूजा का विधान \nपौराणिक मान्यता के अनुसार इस पर्व पर आँवले के वृक्ष की पूजा से अक्षय फल (कभी न खत्म होनेवाले पुण्यफल) की प्राप्ति होती है। साथ ही सौभाग्य में अभिवृद्धि होती है। इस पर्व पर आँवले के वृक्ष की पूजा पुष्प\, धूप\, दीप\, नैवेद्य आदि से की जाती है। पूजन करने के पश्चात् वृक्ष की आरती करके परिक्रमा करनी चाहिए। कुष्माण्ड (कोहड़ा) का दान भी किया जाता है\, जिसमें अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोना\, चाँदी व नगद द्रव्य रखकर भूदेव कर्मनिष्ठ ब्राह्मïण को दान देने से पुण्यफल की प्राप्ति होती है। आँवले के वृक्ष के समीप या नीचे ब्राह्मण को सात्विक भोजन कराकर दान-दक्षिणा देकर पुण्य अर्जित करना चाहिए। इसके अलावा अन्न\, घी एवं अन्य जरूरी वस्तुओं का दान देना भी अक्षय फल की प्राप्ति कराता है। आज के दिन गोदान करने की विशेष महिमा है। \n	धार्मिक-पौराणिक मान्यता \nअक्षय नवमी के दिन किए गए दान से जीवन में जाने-अनजाने में हुए समस्त पापों का शमन हो जाता है। इस दिन पितृलोक में विराजित पितरों को शीत (ठण्ड) से बचाने के लिए संकल्प करके भूदेव (ब्राह्मण) को ऊनी वस्त्र\, कम्बल देने की शास्त्रीय मान्यता है। आँवले के पूजन के लिए यदि आँवले का वृक्ष उपलब्ध न हो तो मिट्टी के नए गमले में आँवले का पौधा लगाकर उसकी विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना करनी चाहिए जिससे जीवन में कल्याण होता रहे। आँवले के पूजन से सुहागिन महिलाओं का सौभाग्य अखण्ड रहता है। आँवले के वृक्ष के पूजन से सन्तान की प्राप्ति भी बतलाई गई है।   \n	व्रतकर्ता के लिए विशेष \nआँवला नवमी पर्व पर तन-मन-धन से पूर्णतया शुचिता के साथ व्रत आदि करना चाहिए। यदि तीन वर्ष तक लगातार व्रत करें तो मनोकामना की पूर्ति के साथ अभीष्ट की प्राप्ति भी होती है। व्रतकर्ता को दिन में शयन नहीं करना चाहिए। दूसरे का अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। व्यर्थ की वार्तालाप से बचना चाहिए। साथ ही मन-वचन-कर्म से शुभ कृत्यों की ओर अग्रसर रहना चाहिए। \n– ज्योतिर्विद् श्री विमल जैन \n\n   \nइन्हें भी पढ़िए..\nयदि आपके दाम्पत्य जीवन में है कुछ खटास तो करें ये उपाय\, होगा सुखी वैवाहिक जीवन\nचन्द्रग्रहण : आपके राशि पर क्या पड़ेगा ग्रहण का प्रभाव\nगोपाष्टमी : कब शुरू हुआ गौ पूजन\, जानिए गाय के शरीर में है किन किन देवता का हैं निवास\nगोपाष्टमी पर्व :आइए जानते हैं गोपाष्टमी पर्व का महत्व\, कथा\, पूजा विधि तथा इस दिन करने वाले महा उपाय\, जिससे जीवन भर रहेगी घर में धन\, वैभव\,और संपदा\nडाला छठ : आखिर क्यों नहीं पहनते सिलाई किए हुए कपड़े\nजानिए छठ पूजा पर सूर्य को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?\nडाला छठ : इसलिए लगाया जाता है नाक से सिंदूर\nछठ पूजा – क्या है “कोसी भराई”\, क्या महत्त्व और विधि है  “कोसी सेवना” का\nछठ महापर्व : ठेकुआ के साथ और क्या चढ़ता है प्रसाद\nजानिये कौन हैं छठ व्रत में पूजित छठी मैया \n\nउम्मीद है कि आपको यह लेख पसंद आया होगा।  अन्य लेख पढ़ने के लिए साथ ही अपनी पसंद – नापसंद जरूर बताएं। .   और जुड़ें रहें हमारी वेबसाइट  ” मोक्ष भूमि – काशी ”  के साथ।  .     हमारी टीम को आपके प्रतिक्रिया का इन्तजार है।9889881111  \n\nखबरों के लिए क्लिक करें –  https://innovest.co.in \n\nयदि आप सनातनी है तो काशी की नष्ट हो रही ऊर्जा को बचाने के लिए अभियान में आप के साथ की जरूरत है। कृपया सम्पर्क करें… 9889881111\, 8765000123
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SUMMARY:सूर्य ग्रहण 25 अक्टूबर को
DESCRIPTION:ग्रहण का स्पर्शकाल\nभारतीय मानक समय के अनुसार 25 अक्टूबर\, मंगलवार की सायं 4 बजकर 23 मिनट पर\nग्रहण का मध्य\nसायं 5 बजकर 28 मिनट पर\nग्रहण का मोक्षकाल\nसायं 6 बजकर 25 मिनट पर होगा। \n– अबकी कार्तिक अमावस्या को लग रहा सूर्यग्रहण\n– सूर्य ग्रहण के 12 घंटे पूर्व आरंभ होता है सूचक
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SUMMARY:रमा एकादशी व्रत मुहूर्त 21st October 2022
DESCRIPTION:रमा एकादशी व्रत मुहूर्त वाराणसी\, भारत के लिए\nरमा एकादशी पारण समय: 05:59:42 से 08:16:47 22 अक्टूबर को अवधि: 2 घंटे 17 मिनट
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SUMMARY:तुला संक्रांति 2022 17 अक्टूबर सोमवार\,  पुण्य काल मुहूर्त: 12:12 PM-05:56 PM
DESCRIPTION:तुला संक्रांति 2022 17 अक्टूबर सोमवार को है
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SUMMARY:करवा चौथ 2022
DESCRIPTION:करवा चौथ पूजा मुहूर्त: 05:33:15 to 06:43:03\nअवधि: 1 Hour 9 Minute\nचंद्र उदय का समय : 07:52:59\n 
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SUMMARY:संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत
DESCRIPTION:आपके जीवन में संकटों का सामना करना पड़ रहा हो तो करे ये पूजन  …\n\nसनातन हिन्दू धर्मशास्त्रों में भगवान श्रीगणेशजी की महिमा अनन्त है। प्रत्येक शुभ कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व सर्वप्रथम गौरीपुत्र श्रीगणेशजी की पूजा-अर्चना करने का विधान है।\n\nसुख-समृद्धि के लिए संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत रखने की धार्मिक  परम्परा है। चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी तिथि के दिन किए जाने वाला व्रत संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी के नाम से जाना जाता है।  संकष्टी  श्रीगणेश चतुर्थी इस बार गुरुवार\, 13 अक्टूबर को पड़ रही है। विमल जैन के अनुसार कार्तिक कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि बुधवार\, 12 अक्टूबर को अर्धरात्रि के पश्चात 2 बजकर 00 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन गुरुवार\, 13 अक्टूबर को अर्धरात्रि के पश्ïचात 3 बजकर 09 मिनट तक रहेगी। चन्द्रोदय रात्रि 7 बजकर 55 मिनट पर होगा। श्रीगणेशजी की पूजा-अर्चना रात्रि में चन्द्र उदय होने के पश्चात् चन्द्रमा को अर्घ  देकर किया जाएगा।]\n\nव्रत का विधान \n संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत के दिन प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर अपने समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त होना चाहिए। तत्पश्चात् अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना करने के उपरान्त अपने दाहिने हाथ में जल\, पुष्प\, फल\, गन्ध व कुश लेकर संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। सम्पूर्ण दिन निराहार रहते हुए व्रत के दिन सायंकाल पुन: स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करके पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर श्रीगणेश जी की पंचोपचार\, दशोपचार अथवा षोडशोपचार से पूजा-अर्चना करनी चाहिए। श्रीगणेशजी को दूर्वा एवं मोदक अति प्रिय है\, इसलिए दूर्वा की माला\, ऋतुफल\, मेवे एवं मोदक अवश्य अॢपत करने चाहिए।\nऐसे होगी मनोरथ की पूर्ति\nश्रीगणेशजी की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी महिमा में यशगान के रूप में श्रीगणेश स्तुति\, संकटनाशन श्रीगणेश स्तोत्र\, श्रीगणेश अथर्वशीर्ष\, श्रीगणेश सहस्रनाम\, श्रीगणेश चालीसा एवं श्रीगणेश जी से सम्बन्धित अन्य स्तोत्र आदि का पाठ अवश्य करना चाहिए। साथ ही श्रीगणेशजी से सम्बन्धित मन्त्र का जप करना विशेष लाभकारी रहता है। ऐसी धाॢमक व पौराणिक मान्यता है कि श्रीगणेश अथर्वशीर्ष का प्रात:काल पाठ करने से रात्रि के समस्त पापों का नाश होता है। संध्या समय पाठ करने पर दिन के सभी पापों का शमन होता है\, यदि विधि-विधानपूर्वक एक हजार पाठ किए जाएं तो मनोरथ की पूर्ति के साथ ही धर्म\, अर्थ\, काम और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।\n\n\nजिन व्यक्तियों की जन्मकुण्डली के अनुसार ग्रहजनित दोष हो तो संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी के दिन व्रत उपवास रखकर सर्वविघ्न विनाशक प्रथम पूज्यदेव भगवान श्रीगणेशजी की पूजा-अर्चना करके लाभ उठाना चाहिए। वर्तमान समय में जिन्हें अपने जीवन में संकटों का सामना करना पड़ रहा हो\, उन्हें भी आज के दिन श्रीगणेश जी का दर्शन-पूजन करके व्रत रखना चाहिए। श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत महिला-पुरुष\, विद्याॢथयों एवं अन्य जनों के लिए समानरूप से फलदायी है। श्रीगणेश पुराण के अनुसार भक्तिभाव व पूर्ण आस्था के साथ किए गए विधि-विधानपूर्वक श्रीगणेश जी पूजा-अर्चना से सर्व संकटों का निवारण होता है साथ ही सुख-समृद्धि में अभिवृद्धि होती है। \n\n\nसंकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत : 13 अक्टूबर\, गुरुवार को\nश्रीगणेश चतुर्थी के व्रत से कटते हैं सारे कष्ट होता है पापों का शमन\nचन्द्रोदय होगा रात्रि 7 बजकर 55 मिनट पर\n\n\n— ज्योतिॢवद्  विमल जैन
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SUMMARY:Ashwin Purnima Vrat Muhurat
DESCRIPTION:पूर्णिमा तिथि शुरू 03:44:06 on October 9\, 2022\nपूर्णिमा तिथि समाप्त at 02:26:43 on October 10\, 2022
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SUMMARY:प्रदोष जानिये प्रदोष काल का शुभ मुहूर्त और कैसे करे पूजन
DESCRIPTION:प्रदोष जानिये प्रदोष काल का शुभ मुहूर्त और कैसे करे पूजन\n आश्विन मास के शुक्लपक्ष की त्रयोदशी तिथि 7 अक्टूबर\, शुक्रवार को प्रात: 7 बजकर 27 मिनट पर लगेगी\, जो कि उसी दिन 7 अक्टूबर\, शुक्रवार को अर्धरात्रि के पश्चात 5 बजकर 26 मिनट तक रहेगी। जिसके फलस्वरूप प्रदोष व्रत 7 अक्टूबर\, शुक्रवार को रखा जाएगा। प्रदोषकाल का समय सूर्यास्त से  48 मिनट या 72 मिनट का माना जाता है। सम्पूर्ण दिन निराहार रहते हुए सायंकाल पुन: स्नान करके स्वच्छ व धारण करके प्रदोषकाल में भगवान शिवजी की पूजा-अर्चना उत्तराभिमुख होकर करने का विधान है। \nऐसे करे प्रदोष व्रत  व्रतकर्ता को प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर समस्त दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर स्नान-ध्यान\, पूजा-अर्चना के पश्चात् अपने दाहिने हाथ में जल\, पुष्प\, फल\, गन्ध व कुश लेकर प्रदोष व्रत का संकल्प लेना चाहिए। दिनभर निराहार रहकर सायंकाल पुन: स्नान करके स्वच्छ वस्ïत्र पहन कर प्रदोष काल में भगवान शिवजी की विधि-विधान पूर्वक पंचोपचार\, दशोपचार अथवा षोडशोपचार श्रद्धा-भक्तिभाव के साथ पूजा-अर्चना करनी चाहिए। देवाधिदेव शिवजी का अभिषेक करके उन्हें वस्त्र\, यज्ञोपवीत\, आभूषण\, सुगन्धित द्रव्य के साथ बेलपत्र\, कनेर\, धतूरा\, मदार\, ऋतुपुष्प\, नैवेद्य आदि अर्पित करके धूप-दीप के साथ पूजा-अर्चना करनी चाहिए।  \nऐसी धार्मिक मान्यता है कि व्रतकर्ता अपने मस्तिष्क पर भस्म और तिलक लगाकर देवाधिदेव शिवजी की पूजा करें तो पूजा शीघ्र फलित होती है। देवाधिदेव महादेव जी की महिमा में प्रदोष स्तोत्र का पाठ एवं स्कन्दपुराण में वॢणत प्रदोष व्रत कथा का पठन या श्रवण अवश्य करना चाहिए। प्रदोष व्रत से सम्बन्धित कथाएँ भी सुननी चाहिए। यह व्रत महिला एवं पुरुष दोनों के लिए समानरूप से फलदायी है। प्रदोष व्रत से जीवन के समस्त दोषों के शमन के साथ ही जीवन में सुख\, समृद्धि व खुशहाली मिलती है।
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SUMMARY:नाटी इमली भरत  मिलाप : अब प्राचीन इमली का पेड़ तो नहीं लेकिन परम्पराओं का निर्वहन आज भी
DESCRIPTION:[vc_row][vc_column] \nबात यदि धर्म ग्रंथो की करे तो दीपावली पर्व प्रभु राम के अयोध्या आने की ख़ुशी में मनाया गया था \, लेकिन शिव की नगरी काशी में दशहरा के अगले दिन प्रभु श्री राम के चारो भाइयो का मिलन होता है ….भरत मिलाप के नाम से जाने जाने वाला यह लीला कई मायने में अपनी अलग पहचान रखता है सबसे बड़ी बात यह है कि मात्र 5 मिनट की होने वाली इस लीला को देखने के लिए लोग घंटो इंजतार करते है\,भक्तो का मानना यह भी है कि इस लीला के दौरान प्रभु स्वयं उपस्थित रहते है \, भक्तो की भारी भीड़ इस बात का घोतक है की आज के इस युग में अभी भी भक्त अपने भगवान को सब कुछ नेछावर करने को तैयार है। \nआकर्षण का केंद्र यादव समुदाय का विशेष परिधान बनारस के लख्खा मेला में शुमार नाटी इमली का रामलीला में प्रभु श्री राम  के उपस्थिति का आभास होता है और यही वजह है की  भरथ मिलाप को देखने के लिए लाखो की संख्या में आज भक्तो आते है।  इस लीला में भक्त श्री राम के जयकारा के साथ ही  हर हर महादेव का उदघोष करते है \, परंपरा के अनुसार  काशी नगरी के राजा रहे काशी नरेश अपने हाथी पर सवार होकर यहाँ पुरे राजकीय शान शौकत से आया करते थे लेकिन समय के बदलने के साथ ही अब राजा परिवार के प्रतिनिधि परिवार आज भी हाथी पर सवार होकर पहुँचते है और लीला में भाग लेते है। भरथ मिलाप अपने नियत समय सायं 4. 55  पर शुरू होता है …इस लीला में प्रभु राम और लक्ष्मण चौदह का वनवास के बाद भरथ और शत्रुधन से गले मिलते है | मात्र 5 मिनट के इस लीला में भगवान का लाग (विमान ) अपने विशेष परिधान में यादव जाति के लोग लेकर जाते है\, जो मेले का एक और आकर्षण होता है। \nशुरुआत सोलहवीं शताब्दी मे गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा\nमान्यता है कि इस मेले का शुभारंभ सोलहवीं शताब्दी मे गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा हुआ था \, जिसे मेधा भगत जी ने आगे बढ़ाया और अब तक जारी है। लक्खा मेला मतलब जिसमें लाखो की भीड़ उपस्थित हो । जो  मेले की भव्यता का बखान करने के लिए शब्दो की सीमा समाप्त होता नजर आता हैं। असल में भाई का भाई के प्रति प्रेम\, अपनी गलती न होने पर भी कारण मात्र समझकर आत्म ग्लानि की पराकाष्ठा का अद्भुत चित्रण इस लीला की विशेषता है। शास्त्रीय प्रमाण और रंगमंचीय प्रबन्धन ऐसा कि समय काल परिस्थिति की पूर्णतः व्यवस्था की जाती है। \nकई मायने में खास होता है लीला लीला के कथानक की बात करें तो भगवान राम को बनवास के बाद भरत जी ने संकल्प किया कि बनवास काल पूर्ण होने के बाद एक दिन भी प्रतीक्षा नही करेंगे और प्राण  त्याग देंगे। अतः सूर्यास्त से पूर्व कुछ मिनट जब सूर्य की किरणें नाटी इमली लीला मंचन क्षेत्र के एक निश्चित बिंदु पर होती है\,\,\,\, भरत मिलाप ठीक उसी समय होता है। इतना भावुक\, इतना आत्म प्रेरक की हर मिनट कार्यक्रम को टकटकी लगाकर लोग हृदयंगम करने के लिए लालयित रहते हैं। कुछ नेमी तो हर साल सब कामकाज से समय निकल कर  तिथियों और तारीख के अंतर को पाटकर समय से पूर्व ही तय स्थान पर आसीन हो जाते हैं जिसमें “काशी नरेश “भी शामिल हैं जिन्हें काशीवासी शिव का अवतार मानते हैं।\n– shlini tripati \n[/vc_column][/vc_row]
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LOCATION:Nati Imli Bharat Milap\, Nati Imli Bharat Milap\, Varanasi\, Uttar Pradesh\, 221010\, India
CATEGORIES:लक्खा मेला वाराणसी
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