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एएसआई सर्वे रिपोर्ट के बाद धार भोजशाला विवाद में नया मोड़: हिंदू पक्ष ने जताया उत्साह, मुस्लिम पक्ष की कानूनी तैयारी, जानिए क्या है पूरा मामला

​विशेष संवाददाता | नई दिल्ली / धार

​मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर को लेकर चल रहा सदियों पुराना कानूनी विवाद अब एक अत्यंत निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। हाल ही में न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत हुई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट और उसके बाद आए अदालती घटनाक्रमों को हिंदू पक्ष अपनी एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक जीत मान रहा है। हिंदू संगठनों का दावा है कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर परिसर पर उनका ऐतिहासिक और धार्मिक अधिकार पूरी तरह से सिद्ध हो चुका है।

​इस बड़े घटनाक्रम के बाद देश भर में भोजशाला प्रकरण एक बार फिर मुख्यधारा की चर्चाओं के केंद्र में है। इस पूरे मामले, कोर्ट के रुख और दोनों पक्षों की वर्तमान स्थिति का तथ्यात्मक और निष्पक्ष विवरण इस प्रकार है:

विवाद की पृष्ठभूमि और एएसआई का वैज्ञानिक सर्वे

​धार की भोजशाला को लेकर वर्षों से यह विवाद चला आ रहा है कि यह मूल रूप से राजा भोज द्वारा निर्मित माता सरस्वती (वाग्देवी) का मंदिर है या कमाल मौलाना की मस्जिद। साल २००३ से लागू एएसआई की व्यवस्था के तहत यहाँ मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिमों को नमाज की अनुमति थी।
​इस व्यवस्था को चुनौती देते हुए ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ ने इंदौर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसके बाद अदालत ने परिसर का वैज्ञानिक सर्वे करने का आदेश दिया था। एएसआई की टीम ने अत्याधुनिक जीपीआर (ग्राउंड पेनिट्रेटिंग राडार), कार्बन डेटिंग और जीपीएस तकनीकों के माध्यम से कई हफ्तों तक परिसर के चप्पे-चप्पे की जांच की थी।

हिंदू पक्ष के दावे और ‘बड़ी जीत’ के आधार

​न्यायालय के समक्ष आए घटनाक्रमों और सर्वे के निष्कर्षों के बाद हिंदू पक्ष का उत्साह चरम पर है। उनके अनुसार, यह उनकी दशकों पुरानी कानूनी लड़ाई की सबसे बड़ी सफलता है। हिंदू पक्ष के मुख्य तर्क और दावे निम्नलिखित बिंदुओं पर आधारित हैं:

​सनातनी कलाकृतियां और अवशेष: हिंदू पक्ष का दावा है कि वैज्ञानिक जांच के दौरान परिसर की दीवारों, खंभों और जमीन के नीचे से प्राचीन सनातन संस्कृति से जुड़ी मूर्तियां, खंडित कलाकृतियां और देव-प्रतिमाओं के अवशेष मिले हैं।
​संस्कृत शिलालेख: परिसर के स्तंभों पर पाए गए प्राचीन संस्कृत के शिलालेख और नक्काशीदार प्रतीक इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि यह संरचना इस्लामी शासनकाल से बहुत पहले राजा भोज द्वारा निर्मित ‘सरस्वती कंठाभरण’ विश्वविद्यालय (भोजशाला) थी।
​परिवर्तन के साक्ष्य: हिंदू संगठनों का कहना है कि रिपोर्ट से यह साफ हो चुका है कि एक पूर्व-निर्मित भव्य मंदिर के ढांचे को ही आंशिक रूप से बदलकर मस्जिद का रूप देने का प्रयास किया गया था, इसलिए इस स्थान का मूल स्वरूप मंदिर का ही है।

मुस्लिम पक्ष का रुख और कानूनी आपत्तियां

​दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष (सुन्नी वक्फ बोर्ड और कमल मौला मस्जिद समिति) इस स्थिति को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर रहा है और ऊपरी अदालतों में कानूनी लड़ाई को और तेज करने की तैयारी में है।

​प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट का हवाला: मुस्लिम पक्ष का मुख्य वैधानिक आधार ‘धार्मिक स्थल अधिनियम १९९१’ (Places of Worship Act, 1991) है। उनका तर्क है कि १५ अगस्त १९४७ को इस स्थान का जो धार्मिक स्वरूप था, कानूनन उसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।
​साक्ष्यों पर असहमति: मुस्लिम पक्ष के वकीलों का कहना है कि सर्वे के दौरान मिले कुछ अवशेषों या निशानों को सीधे तौर पर पूरी संरचना का आधार नहीं माना जा सकता और वे अदालत में इन तकनीकी निष्कर्षों पर अपनी विस्तृत आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं।

आगे की राह: क्या होगा अदालत का अंतिम फैसला?

​कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, भले ही वर्तमान साक्ष्यों और अदालती टिप्पणियों के बाद जमीन पर हिंदू पक्ष का दावा बेहद मजबूत दिखाई दे रहा है और वे इसे अपनी बड़ी वैधानिक विजय मान रहे हैं, लेकिन इस परिसर के अंतिम भविष्य का फैसला पूरी तरह से अदालत के अंतिम डिक्री (Fianl Decree) पर निर्भर करेगा।

​सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए बेहद फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि कोई भी अंतिम आदेश देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने और कानून व्यवस्था को प्रभावित किए बिना, पूरी तरह से ऐतिहासिक व वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर ही पारित किया जाए। आने वाले दिनों में कोर्ट की अंतिम सुनवाई पर पूरे देश की निगाहें टिकी रहेंगी।

Author: Admin Editor MBC

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