तंत्र शास्त्र : तंत्र में काम-ऊर्जा क्या हैं इसको ब्रह्मानंद तक का आध्यात्मिक सफर कैसे कहा गया!
तंत्र डेस्क | काशी
भारतीय संस्कृति में तंत्र-मार्ग को सदैव रहस्यमयी और विस्मयकारी माना गया है। अक्सर भ्रांतियों के घेरे में रहने वाले इस मार्ग का वास्तविक उद्देश्य देह के माध्यम से देहातीत (देह से परे) होना है। तंत्र शास्त्र के अनुसार, मानव शरीर ऊर्जा का एक ऐसा स्रोत है जिसे यदि सही दिशा दी जाए, तो वह साक्षात् ईश्वर से साक्षात्कार का माध्यम बन सकता है।
वसन से वासना: देह के बंधन की वैज्ञानिक व्याख्या ‘वासना’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘वसन’ (वस्त्र) से मानी गई है। तंत्र विशेषज्ञों का मानना है कि जिस प्रकार वस्त्र देह को ढंकते हैं, उसी प्रकार वासना आत्मा के वास्तविक स्वरूप को ढंक लेती है। साधना के उच्च सोपानों में वस्त्र-विहीन देह से आत्मस्वरूप का ध्यान करना साधक को बाह्य आवरणों और मानसिक ग्रंथियों से मुक्त होने में सहायक होता है।
स्त्री: शक्ति का जीवंत प्रतीक
दुर्गा सप्तशती के अनुसार, ‘स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु’—अर्थात् इस जगत में जो कुछ भी चैतन्य है, वह स्त्री-रूप (शक्ति) ही है। तंत्र साधना में स्त्री को केवल एक सहभागी नहीं, बल्कि साक्षात् शक्ति का प्रतीक माना गया है।
चुंबकीय ऊर्जा का विज्ञान: पुरुष और स्त्री की देह एक-दूसरे की पूरक हैं। तंत्र के अनुसार, पुरुष देह में जो नकारात्मक (Negative) ध्रुव है, वह स्त्री देह में सकारात्मक (Positive) है। जब इन दोनों ऊर्जाओं का गहन समागम होता है, तो एक पूर्ण ‘विद्युत परिपथ’ बनता है, जो साधक को मूलाधार से सहस्रार चक्र तक ले जाने की क्षमता रखता है।
ऊर्ध्वमुखी ऊर्जा: काम शक्ति का आत्मशक्ति में रूपांतरण
तंत्र का मूल विज्ञान ऊर्जा के प्रवाह को बदलने में है:
अधोमुखी प्रवाह: सामान्यतः ऊर्जा मूलाधार चक्र से जननेंद्रिय के मार्ग से नीचे प्रवाहित होकर प्रकृति में विलीन हो जाती है।
ऊर्ध्वमुखी प्रवाह: साधना के माध्यम से जब यही ऊर्जा आज्ञा चक्र से होकर ऊपर उठती है, तो वह सहस्रार में स्थित ब्रह्म से एकीकृत हो जाती है। इसे ही तंत्र में ‘ब्रह्म-सुख’ या ‘परमानंद’ कहा गया है।
भैरवी-चक्र: हर कोई नहीं है इसका अधिकारी
तंत्र में नारी का स्थान सर्वोच्च और पूजनीय है। लेकिन ‘निर्वाण-तंत्र’ स्पष्ट चेतावनी देता है कि भैरवी-चक्र-पूजा का अधिकार हर किसी को नहीं है। इसके लिए साधक का:
ब्रह्मज्ञानी और शुद्ध अंतःकरण वाला होना अनिवार्य है।
निर्विकार, दयावान और दृढ़व्रती होना आवश्यक है।
देहाभिमान से मुक्त होकर स्वयं को भैरव और भैरवी स्वरूप में ढालना जरूरी है।
”शक्ति-संगम के आरम्भ से लेकर उसके आवेश के अंत तक जो अलौकिक सुख प्राप्त होता है, वही वास्तव में ब्रह्म-तत्व की अनुभूति है।”
तंत्र मार्ग काम-ऊर्जा को दबाने के बजाय उसे ‘डायनामाइट’ की तरह उपयोग करने की विधि है, ताकि आध्यात्मिक लक्ष्य जो वर्षों में प्राप्त होते हैं, वे कुछ महीनों की तीव्र साधना से सिद्ध हो सकें। यह मार्ग भोग को योग में बदलने की एक प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक पद्धति है।
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