गरुड़ पुराण : मृत्यु के बाद क्यों तड़पती है आत्मा? जानें यमलोक के मार्ग में भूख और प्यास का रहस्य
हिंदू धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘गरुड़ पुराण’ में मृत्यु और उसके बाद की यात्रा का विस्तार से वर्णन किया गया है। अक्सर हमारे मन में यह जिज्ञासा होती है कि शरीर त्यागने के बाद जब आत्मा सूक्ष्म रूप में होती है, तो उसे भूख और प्यास जैसी मानवीय संवेदनाएं क्यों महसूस होती हैं?
गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद की यात्रा आसान नहीं होती। जीवात्मा को अपने कर्मों के आधार पर एक कठिन मार्ग से गुजरना पड़ता है, जहाँ उसे असहनीय कष्टों का सामना करना पड़ता है।
वैतरणी और यमलोक का दुर्गम मार्ग
गरुड़ पुराण में उल्लेख है कि मृत्यु के उपरांत आत्मा जब यमलोक की यात्रा शुरू करती है, तो उसे 86 हजार योजन की दूरी तय करनी होती है। इस मार्ग में न तो कहीं विश्राम के लिए छाया है और न ही बैठने का कोई स्थान। सूर्य की प्रचंड तपन से आत्मा झुलसने लगती है और उसे तीव्र प्यास का अनुभव होता है।
माया का जाल: सामने दिखता है जल, पर मिलता नहीं
इस यात्रा के दौरान आत्मा को प्यास के कारण ऐसा आभास होता है जैसे सामने कोई शीतल सरोवर या जल का स्रोत हो। लेकिन जैसे ही प्यासी आत्मा उस जल की ओर बढ़ती है, वह दृश्य ओझल हो जाता है। यह मार्ग की बाधाओं और उसके पिछले जन्म के पापों का परिणाम होता है, जो उसे तृप्ति से दूर रखते हैं।
क्यों लगती है भूख और प्यास?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरीर छूटने के बाद भी आत्मा में ‘वासना’ और ‘संस्कार’ जीवित रहते हैं। चूंकि आत्मा ने वर्षों तक भौतिक शरीर के माध्यम से अन्न और जल का उपभोग किया होता है, इसलिए सूक्ष्म शरीर में भी वह तृप्ति की इच्छा बनी रहती है।
गरुड़ पुराण का संदेश: “यमलोक के मार्ग में वही आत्माएं सुख पाती हैं, जिन्होंने जीवित रहते हुए अन्न और जल का दान किया हो। बिना दान-पुण्य के आत्मा प्यास से व्याकुल होकर भटकती रहती है।”
पिंडदान और तर्पण का महत्व
शास्त्रों में बताया गया है कि मृत्यु के बाद 10 दिनों तक दिए जाने वाले पिंडदान से आत्मा के ‘अंग’ बनते हैं और 11वें व 12वें दिन के भोजन से उसे उस लंबी यात्रा के लिए शक्ति प्राप्त होती है। परिजनों द्वारा किया गया तर्पण और दान ही उस मार्ग में आत्मा की भूख और प्यास शांत करने का एकमात्र साधन बनता है।
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