Mahashivratri : महाशिवरात्रि के दिन नहीं हुआ था शिव पार्वती या शिव सती का विवाह
यह एक बहुत ही दिलचस्प और तार्किक विषय है जिस पर अक्सर विद्वानों के बीच चर्चा होती रहती है। हिंदू पुराणों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार महाशिवरात्रि के महत्व को लेकर अलग-अलग मत मिलते हैं।
1. शिव पुराण बनाम लोक मान्यता
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (महाशिवरात्रि) को हुआ था। लेकिन कई विद्वान इसे विवाह के बजाय ‘शिव के प्राकट्य’ या उनके ‘ज्योतिर्लिंग रूप’ में प्रकट होने का दिन मानते हैं।
2. सती और पार्वती के विवाह की तिथियाँ
अगर हम गहराई में जाएं, तो कई मान्यताओं के अनुसार:
शिव-सती विवाह: यह वैशाख महीने की शुक्ल पक्ष की नवमी को माना जाता है।
शिव-पार्वती विवाह:
कुछ परंपराओं में इसे ‘मार्गशीर्ष’ (अगहन) मास की पंचमी को विवाह पंचमी के आस-पास भी देखा जाता है।
महाशिवरात्रि का असली अर्थ:
लिंग पुराण के अनुसार, यह वह दिन है जब भगवान शिव ने सबसे पहले लिंग रूप धारण किया था ताकि ब्रह्मा और विष्णु के बीच का विवाद सुलझाया जा सके।
3. साधना की रात
योगिक परंपरा में महाशिवरात्रि का संबंध विवाह से नहीं, बल्कि शांति और शून्यता से है। इस दिन पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध इस तरह स्थित होता है कि मनुष्य के भीतर की ऊर्जा स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर बढ़ती है। इसलिए इसे ‘अध्यात्म की रात’ माना जाता है, न कि केवल एक सामाजिक उत्सव।
शिव महापुराण (विशेषकर रुद्र संहिता), श्री लिंग पुराण, श्री स्कंद पुराण आदि पुराणों में शिव और पार्वती का विवाह को मुख्य रूप से मार्गशीर्ष (अगहन) माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि दिन सोमवार को बताया गया हैं, न कि महाशिवरात्रि को। कुछ संदर्भों में कुछ जगह विवाह का समय वैशाख शुक्ल पंचमी भी बताया गया है, लेकिन मार्गशीर्ष के अगहन मास को ही अधिक मान्यता प्राप्त है। महाशिवरात्रि को शिवजी के लिंग रूप में प्रकट होने का दिन माना जाता है।
आइए शिव पुराण से देखते हैं-:
शिव और भगवती सती के विवाह के विषय में शिव पुराण के रुद्र संहिता के सती खंड में अध्याय नंबर 18 में श्लोक संख्या 20 में तथा रुद्र संहिता सती खंड के अध्याय नंबर 20 में श्लोक संख्या 38 में निम्नलिखित वचन प्राप्त होते हैं
1) चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी में रविवार को पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में भगवान महेश्वर ने विवाह के लिए यात्रा तथा विवाह कार्य संपन्न किया
– रुद्र संहिता सती खंड शिव महापुराण
अब भगवान शंकर और माता पार्वती के विवाह तिथि के विषय में शिव पुराण क्या कहती है देखते हैं.. शिव पुराण के रूद्र संहिता के पार्वती खंड के अध्याय नंबर 35 के श्लोक संख्या 58 से 60 तक मे
वशिष्ठ जी हिमालय जी को कहते हैं कि-:
एक सप्ताह बीतने पर एक दुर्लभ उत्तम शुभ योग आ रहा है उस लग्न में लग्न का स्वामी स्वयं अपने घर में स्थित है और चंद्रमा भी अपने पुत्र बुद्ध के साथ स्थिति रहेगा। चंद्रमा रोहिणी युक्त होगा मार्गशीर्ष का महीना है। सोमवार का दिन है। इस शुभ योग में आप अपनी पुत्री को शिवजी के लिए समर्पित करके कृत्य हो जाइए
– शिव महापुराण रूद्र संहिता पार्वती खंड
इन दोनों प्रमाणो से यह बात सिद्ध होती है कि शिव जी का विवाह महाशिवरात्रि के दिन नहीं हुआ था क्योंकि महाशिवरात्रि तो फाल्गुन मास में पड़ती है।
तो आईए जानते हैं की महाशिवरात्रि के दिन असल में हुआ क्या था। क्यों इसे महाशिवरात्रि कहा जाता है और यह इतनी महत्वपूर्ण क्यों है जानते हैं इसका भी उत्तर शिव महापुराण में ही दिया गया है।
शिव महापुराण के विद्येश्वर संहिता के अध्याय नंबर 8 के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन ही भगवान शंकर जी ने सबसे पहले ब्रह्मा और विष्णु को अपने साकार स्वरूप का दर्शन कराया था। निराकार से साकार हुए थे यानि प्रकट हुए थे इसलिए इस दिन शिवरात्रि मनाई जाती है और शिव पूजन किया जाता है।
शिव पुराण में इस विवाह का वर्णन बहुत ही विस्तार और भव्यता के साथ किया गया है। यहाँ उससे जुड़ी कुछ प्रमुख बातें दी गई हैं:
विवाह से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी:
विवाह का स्थल: हिमालय राज (पार्वती जी के पिता) की राजधानी, जिसे ओषधिप्रस्थ कहा गया है।
बारात का स्वरूप: शिव जी की बारात अत्यंत अनोखी थी, जिसमें देवता, ऋषि-मुनि, गंधर्वों के साथ-साथ भूत-प्रेत, पिशाच और नंदी जैसे गण भी शामिल थे।
विवाह का उद्देश्य: तारकासुर नामक राक्षस का वध करने के लिए शिव और शक्ति का मिलन अनिवार्य था, क्योंकि उसे वरदान था कि उसका वध केवल शिव के पुत्र द्वारा ही हो सकता है।
कठोर तपस्या: माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए हजारों वर्षों तक अत्यंत कठिन तपस्या की थी।
सप्तऋषियों की परीक्षा: शिव जी ने माता पार्वती की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए सप्तऋषियों को भेजा था, जिसमें वे सफल रहीं।
विवाह संस्कार: पौराणिक कथाओं के अनुसार, ब्रह्मा जी इस विवाह के मुख्य पुरोहित (पंडित) बने थे और श्री विष्णु ने माता पार्वती के भाई की भूमिका निभाई थी।
विशेष तथ्य: शिव पुराण के अनुसार, यह विवाह केवल दो शरीरों का मिलन नहीं, बल्कि ‘पुरुष’ (शिव) और ‘प्रकृति’ (शक्ति) के एकाकार होने का प्रतीक है, जिससे सृष्टि का संतुलन बना रहता है।
विश्वनाथ मंदिर 2.3 km, कालभैरव 4 km, संकटमोचन 1.2 km, अस्सी घाट .70 km
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