Dev Dipawali : रावण से भी बलशाली था त्रिपुरासुर असुर, शिव जी द्वारा वध के बाद देवता ने मनाया था देव दीपावली
शिवपुराण में रुद्र सहिंता के युद्ध काण्ड में अध्याय 1 से 10 में इनकी कथा है। काशीखण्ड अध्याय 66 में दीपदान एवं देव दीपावली का भी उल्लेख अंकित है।
असुरो का वध शिव जी ने किया था और शिव जी को इस युद्ध के लिए राजी करने के लिए विष्णु जी को वेद मार्ग और शिव लिंग की भक्ति का खंडन करने वाला एक नया धर्म चलाना पड़ा और यह धर्म कलियुग तक कायम रहने वाला था लेकिन इसके अलावा अन्य कोई उपाय भी नही था इसलिए विष्णु जी ने यज्ञ से एक मुंडी को प्रकट किया जिसका नाम आरहन था और उसे निर्देश दिया कि वह त्रिपुर में जा कर अहिंसा धर्म का प्रतिपादन करे और यज्ञ, वेदों और बली आदि हिंसा का खंडन करे इससे वह असुर इस धर्म मे दीक्षित हो जाएगा और शिव जी की भक्ति करना छोड़ देंगे। नारद जी की वजह से ऐसा ही हुआ और वे सभी असुर और सभी दानव अरन्त धर्म मे दीक्षित हो गए व उन्होंने शिव जी की उपासना व भक्ति करना छोड़ दिया और इस बात से शिव जी अप्रसन्न हो गए और उन्होंने त्रिपुरासुर का वध कर दिया लेकिन उस समय जो अहिंसा को मुख्य धर्म के रूप में प्रवर्तन किया वह धर्म अहिंसा परमो धर्म बन कर आज तक चला आ रहा है।
भगवान शिव ने अपने एक ही बाण से जलाकर भस्म कर दिया था इन तीन घुमते हुए शहरों को
असुर बालि की कृपा प्राप्त त्रिपुरासुर भयंकर असुर बन गया था। महाभारत के कर्णपर्व में त्रिपुरासुर के वध की कथा बड़े विस्तार से मिलती है। भगवान कार्तिकेय द्वारा तारकासुर का वध करने के बाद उसके तीनों पुत्रों ने देवताओं से बदला लेने का प्रण कर लिया। तीनों पुत्र तपस्या करने के लिए जंगल में चले गए और हजारों वर्ष तक अत्यंत दुष्कर तप करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया। तीनों ने ब्रह्माजी से अमरता का वरदान मांगा। ब्रह्माजी ने उन्हें मना कर दिया और कहने लगे कि कोई ऐसी शर्त रख लो, जो अत्यंत कठिन हो। उस शर्त के पूरा होने पर ही तुम्हारी मृत्यु हो।
तीनों ने खूब विचार कर, ब्रह्माजी से वरदान मांगा- हे प्रभु! आप हमारे लिए तीन पुरियों का निर्माण कर दें और वे तीनों पुरियां जब अभिजित् नक्षत्र में एक पंक्ति में खड़ी हों और कोई क्रोधजित् अत्यंत शांत अवस्था में असंभव रथ और असंभव बाण का सहारा लेकर हमें मारना चाहे, तब हमारी मृत्यु हो। ब्रह्माजी ने कहा- तथास्तु!
शर्त के अनुसार उन्हें तीन पुरियां (नगर) प्रदान की गईं। तारकाक्ष के लिए स्वर्णपुरी, कमलाक्ष के लिए रजतपुरी और विद्युन्माली के लिए लौहपुरी का निर्माण विश्वकर्मा ने कर दिया। इन तीनों असुरों को ही त्रिपुरासुर कहा जाता था। इन तीनों भाइयों ने इन पुरियों में रहते हुए सातों लोको को आतंकित कर दिया। वे जहां भी जाते समस्त सत्पुरुषों को सताते रहते। यहां तक कि उन्होंने देवताओं को भी, उनके लोकों से बाहर निकाल दिया।
सभी देवताओं ने मिलकर के अपना सारा बल लगाया, लेकिन त्रिपुरासुर का प्रतिकार नहीं कर सके और अंत में सभी देवताओं को तीनों से छुप-छुपकर रहना पड़ा। अंत में सभी को शिव की शरण में जाना पड़ा। भगवान् शंकर ने कहा- सब मिलकर के प्रयास क्यों नहीं करते? देवताओं ने कहा- यह हम करके देख चुके हैं। तब शिव ने कहा- मैं अपना आधा बल तुम्हें देता हूं और तुम फिर प्रयास करके देखो, लेकिन सम्पूर्ण देवता सदाशिव के आधे बल को सम्हालने में असमर्थ रहे। तब शिव ने स्वयं त्रिपुरासुर का संहार करने का संकल्प लिया।
त्रिपुरासुर का वध
सभी देवताओं ने शिव को अपना-अपना आधा बल समर्पित कर दिया। अब उनके लिए रथ और धनुष बाण की तैयारी होने लगी जिससे रणस्थल पर पहुंचकर तीनों असुरों का संहार किया जा सके। इस असंभव रथ का पुराणों में विस्तार से वर्णन मिलता है।
पृथ्वी को ही भगवान् ने रथ बनाया, सूर्य और चन्द्रमा पहिए बन गए, सृष्टा सारथी बने, विष्णु बाण, मेरूपर्वत धनुष और वासुकी बने उस धनुष की डोर। इस प्रकार असंभव रथ तैयार हुआ और संहार की सारी लीला रची गई। जिस समय भगवान् उस रथ पर सवार हुए, तब सकल देवताओं के द्वारा सम्हाला हुआ वह रथ भी डगमगाने लगा। तभी विष्णु भगवान् वृषभ बनकर उस रथ में जा जुड़े। उन घोड़ों और वृषभ की पीठ पर सवार होकर महादेव ने उस असुर नगर को देखा और पाशुपत अस्त्र का संधान कर, तीनों पुरों को एकत्र होने का संकल्प करने लगे।
उस अमोघ बाण में विष्णु, वायु, अग्नि और यम चारों ही समाहित थे। अभिजित् नक्षत्र में, उन तीनों पुरियों के एकत्रित होते ही भगवान शंकर ने अपने बाण से पुरियों को जलाकर भस्म कर दिया और तब से ही भगवान शंकर त्रिपुरांतक बन गए। त्रिपुरासुर को जलाकर भस्म करने के बाद भोले रुद्र का हृदय द्रवित हो उठा और उनकी आंख से आंसू टपक गए। आंसू जहां गिरे वहां ‘रुद्राक्ष’ का वृक्ष उग आया। ‘रुद्र’ का अर्थ शिव और ‘अक्ष’ का आंख अथवा आत्मा है।
त्रिपुरासुर और गणेश
एक अन्य कथा अनुसार भगवान शंकर त्रिपुरासुर का वध करने जाते हैं परंतु उन्हें सफलता नहीं मिलती। हर बार असफल हो जाने के बाद वे सोचते हैं कि आखिर उनके कार्य में विघ्न क्यों पड़ा? तब उन्हें ज्ञात होता है कि वे गणेशजी की अर्चना किए बगैर त्रिपुरासुर से युद्ध करने चले गए थे। इसके बाद उन्होंने अपने पुत्र गणेशजी का पूजन करके उन्हें लड्डुओं का भोग लगाया और दोबारा त्रिपुरासुर पर आक्रमण किया। इसके बाद ही वे लक्ष्य भेदने में सफल हुए।
विश्वनाथ मंदिर 1 km, कालभैरव 2 km, संकटमोचन .75km, अस्सी घाट .50 km
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