Home 2026 महाशिवरात्रि विशेष: शास्त्रों के पन्नों से… जानिए क्यों है फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात इतन

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महाशिवरात्रि विशेष: शास्त्रों के पन्नों से… जानिए क्यों है फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात इतनी रहस्यमयी और फलदायी


– डॉ संतोष ओझा, काशी

Mahashivratri: सनातन धर्म में व्रतों और पर्वों का विशेष महत्व है, लेकिन फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आने वाली ‘महाशिवरात्रि’ को देवों के देव महादेव की आराधना का सबसे बड़ा दिन माना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि शास्त्रों और पुराणों में इस एक विशिष्ट रात्रि को इतना अधिक महत्व क्यों दिया गया है? आइए, धर्म ग्रंथों के पन्नों को पलटकर जानते हैं महाशिवरात्रि का शास्त्रीय महत्व।

१. शिव पुराण:

पापों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति शिव पुराण के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन किया गया व्रत और रात्रि जागरण जन्म-जन्मांतर के पापों को भस्म कर देता है। मान्यता है कि इस दिन जो भी भक्त सच्चे मन से शिवलिंग पर बिल्वपत्र (बेलपत्र) अर्पित करता है और रात्रि जागरण कर शिव महिमा का गान करता है, उसे सीधे शिवलोक (कैलाश) की प्राप्ति होती है। शिव पुराण में एक शिकारी की कथा भी आती है, जिसने अनजाने में शिवरात्रि की रात शिवलिंग पर बेलपत्र गिरा दिए थे, और अनजाने में हुए इस कृत्य से ही उसे मोक्ष मिल गया था।

२. ईशान संहिता:

ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य
ईशान संहिता में महाशिवरात्रि को ब्रह्मांड के सृजन और ज्योतिर्लिंग के प्राकट्य से जोड़ा गया है। शास्त्रों में वर्णित है:

“फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। शिवलिंगतयोद्भूतः कोटिसूर्यसमप्रभः॥”

अर्थात, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की महानिशा (मध्य रात्रि) में भगवान शिव करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले अनंत ‘ज्योतिर्लिंग’ के रूप में प्रकट हुए थे। ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता के विवाद को शांत करने के लिए महादेव ने यह स्वरूप धारण किया था। इसलिए इस रात को ‘शिवलिंग के जन्म की रात’ के रूप में पूजा जाता है।

३. स्कंद पुराण:

शिव-पार्वती विवाह का महापर्व
स्कंद पुराण सहित कई अन्य ग्रंथों में उल्लेख है कि महाशिवरात्रि ही वह पावन तिथि है, जब वैरागी शिव ने गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था। इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह संपन्न हुआ था। यह शिव (चेतना/पुरुष) और शक्ति (ऊर्जा/प्रकृति) के मिलन की रात है, जो सृष्टि के संतुलन का प्रतीक है।

४. समुद्र मंथन और नीलकंठ

पौराणिक मान्यताओं में एक अन्य कथा ‘समुद्र मंथन’ की भी आती है। जब मंथन से ‘हलाहल’ नामक भयंकर विष निकला, तो पूरी सृष्टि जलने लगी। तब भगवान शिव ने उस विष को पीकर अपने कंठ में रोक लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। विष के प्रभाव को कम करने के लिए देवताओं ने पूरी रात शिवजी को जगाए रखा और उन्हें जल व बेलपत्र अर्पित किए। इसी घटना की याद में शिवरात्रि पर रुद्राभिषेक और रात्रि जागरण का विधान है।

मुख्य शास्त्रीय नियम और पूजा विधान:

निशीथ काल पूजा: शिवरात्रि पर मध्य रात्रि (निशीथ काल) की पूजा का सबसे अधिक महत्व बताया गया है।

चार प्रहर की पूजा: शास्त्रों में रात के चारों प्रहर में शिव पूजा का विधान है। हर प्रहर में दूध, दही, घी और शहद से अलग-अलग रुद्राभिषेक किया जाता है।

बिल्वपत्र का महत्व: त्रिगुणात्मक बेलपत्र अर्पित करना तीनों जन्मों के पाप नष्ट करने वाला माना गया है।

चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं। अत: ज्योतिष शास्त्रों में इसे परम कल्याणकारी कहा गया है। वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है। परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि कहा गया है। शिवरहस्य में कहा गया है ।

“चतुर्दश्यां तु कृष्णायां फाल्गुने शिवपूजनम्। तामुपोष्य प्रयत्नेन विषयान् परिवर्जयेत।। शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापप्रणाशनम्।”

फाल्गुन मास के कृष्ण चतुर्दशी को अर्ध रात्रि की पूजा का शास्त्रों में संदर्भ

स्कन्दपुराण

‘निशिभ्रमन्ति भूतानि शक्तयः शूलभृद यतः । अतस्तस्यां चतुर्दश्यां सत्यां तत्पूजनं भवेत् ॥’

अर्थात् रात्रिके समय भूत, प्रेत, पिशाच, शक्तियाँ और स्वयं शिवजी भ्रमण करते हैं; अतः उस समय इनका पूजन करने से मनुष्य के पाप दूर हो जाते हैं ।

शिवपुराण

कालो निशीथो वै प्रोक्तोमध्ययामद्वयं निशि ॥
शिवपूजा विशेषेण तत्काले ऽभीष्टसिद्धिदा एवं ज्ञात्वा नरः कुर्वन्यथोक्तफलभाग्भवेत्।।

अर्थात रात के चार प्रहरों में से जो बीच के दो प्रहर हैं, उन्हें निशीधकाल कहा गया हैं | विशेषत: उसी काल में की हुई भगवान शिव की पूजा अभीष्ट फल को देनेवाली होती है – ऐसा जानकर कर्म करनेवाला मनुष्य यथोक्त फलका भागी होता है |

शिवपुराण में ईशान संहिता

“फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:॥”

अर्थात फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोडों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए इसलिए इसे महाशिवरात्रि मानते हैं।

शिवपुराण में विद्येश्वर संहिता

शिवरात्रि के दिन ब्रह्मा जी तथा विष्णु जी ने अन्यान्य दिव्य उपहारों द्वारा सबसे पहले शिव पूजन किया था जिससे प्रसन्न होकर महेश्वर ने कहा था की “आजका दिन एक महान दिन है | इसमें तुम्हारे द्वारा जो आज मेरी पूजा हुई है, इससे मैं तुम लोगोंपर बहुत प्रसन्न हूँ | इसीकारण यह दिन परम पवित्र और महान – से – महान होगा | आज की यह तिथि ‘महाशिवरात्रि’ के नामसे विख्यात होकर मेरे लिये परम प्रिय होगी | इसके समय में जो मेरे लिंग (निष्कल – अंग – आकृति से रहित निराकार स्वरूप के प्रतीक ) वेर (सकल – साकाररूप के प्रतीक विग्रह) की पूजा करेगा, वह पुरुष जगत की सृष्टि और पालन आदि कार्य भी कर सकता हैं | जो महाशिवरात्रि को दिन-रात निराहार एवं जितेन्द्रिय रहकर अपनी शक्ति के अनुसार निश्चलभाव से मेरी यथोचित पूजा करेगा, उसको मिलनेवाले फल का वर्णन सुनो | एक वर्षतक निरंतर मेरी पूजा करनेपर जो फल मिलता हैं, वह सारा केवल महाशिवरात्रि को मेरा पूजन करने से मनुष्य तत्काल प्राप्त कर लेता हैं | जैसे पूर्ण चंद्रमा का उदय समुद्र की वृद्धि का अवसर हैं, उसी प्रकार यह महाशिवरात्रि तिथि मेरे धर्म की वृद्धि का समय हैं | इस तिथिमे मेरी स्थापना आदि का मंगलमय उत्सव होना चाहिये |

तिथितत्त्व के अनुसार शिव को प्रसन्न करने के लिए महाशिवरात्रि पर उपवास की प्रधानता तथा प्रमुखता है क्योंकि भगवान् शंकर ने खुद कहा है –

“न स्नानेन न वस्त्रेण न धूपेन न चार्चया। तुष्यामि न तथा पुष्पैर्यथा तत्रोपवासतः।।”

‘मैं उस तिथि पर न तो स्नान, न वस्त्रों, न धूप, न पूजा, न पुष्पों से उतना प्रसन्न होता हूँ, जितना उपवास से।’

स्कंदपुराण

“सागरो यदि शुष्येत क्षीयेत हिमवानपि।
मेरुमन्दरशैलाश्च रीशैलो विन्ध्य एव च॥
चलन्त्येते कदाचिद्वै निश्चलं हि शिवव्रतम्।”

अर्थात् ‘चाहे सागर सूख जाये, हिमालय भी क्षय को प्राप्त हो जाये, मन्दर, विन्ध्यादि पर्वत भी विचलित हो जाये, पर शिव-व्रत कभी निष्फल नहीं हो सकता।’ इसका फल अवश्य मिलता है।

स्कंदपुराण में आता है

“परात्परं नास्ति शिवरात्रि परात्परम् |
न पूजयति भक्तयेशं रूद्रं त्रिभुवनेश्वरम् |
जन्तुर्जन्मसहस्रेषु भ्रमते नात्र संशयः||”

‘शिवरात्रि व्रत परात्पर (सर्वश्रेष्ठ) है, इससे बढ़कर श्रेष्ठ कुछ नहीं है | जो जीव इस रात्रि में त्रिभुवनपति भगवान महादेव की भक्तिपूर्वक पूजा नहीं करता, वह अवश्य सहस्रों वर्षों तक जन्म-चक्रों में घूमता रहता है |’

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एकादशी को अन्न खाने से पाप लगता है और शिवरात्रि, रामनवमी तथा जन्माष्टमी के दिन अन्न खाने से दुगना पाप लगता है। अतः महाशिवरात्रि का व्रत अनिवार्य है।

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विश्वनाथ मंदिर  2.3 km, कालभैरव 4 km, संकटमोचन 1.2 km, अस्सी घाट .70 km


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Author: Admin Editor MBC

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