Makar Sankranti : मकर संक्रांति 14 या 15 को, जानिए क्यों बदलती है तारीखें
– डॉ संतोष ओझा, काशी
भारत के प्रमुख पर्वों में से एक मकर संक्रान्ति है। मकर संक्रांति भारत और नेपाल में भिन्न नाम और रूप में मनाया जाता है। दरअसल पौष मास में जिस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है उस दिन मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है। मकर संक्रांति के बाद से सूर्य दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर बढ़ता है। इसी कारण इस पर्व को ‘उतरायण’ (सूर्य उत्तर की ओर) भी कहते है। वैज्ञानिक तौर पर इसका मुख्य कारण पृथ्वी का निरंतर 6 महीनों के समय अवधि के उपरांत उत्तर से दक्षिण की ओर वलन करता है जो एक प्राकृतिक प्रक्रिया है।
जानिए मकर संक्रांति का महत्व
धर्म ग्रंथो के अनुसार इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उनके घर जाते हैं । क्योंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है । कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति तक के काल को दक्षिणायन कहते है । शास्त्रों के अनुसार, उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात माना जाता है। उत्तरायण में मृत्यु हुए व्यक्ति की अपेक्षा दक्षिणायन में मृत्यु हुए जीव की यम लोक में जाने की संभावना अधिक होती है । सूर्य के मकर राशि में जाते ही खरमास समाप्त हो जाएगा और मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं।
2026 में मकर संक्रांति का पुण्यकाल
इस साल मकर संक्रांति विशेष तौर पर पुण्यदायक मानी जा रही है। सालों बाद षटतिला एकादशी और मकर संक्रांति का संयोग बन रहा है साथ ही सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है। मकर संक्रांति को स्नान और दान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। शास्त्रीय नियमों के अनुसार, सामान्य संक्रांतियों में आठ घड़ी पूर्व और आठ घड़ी बाद का पुण्यकाल माना जाता है। जबकि मकर संक्रांति अयन संक्रांति होने के कारण चालीस घड़ी पूर्व से पुण्य प्रभाव स्वीकार किया गया है, जिसके कारण प्रातः काल स्नान-दान की परंपरा शास्त्र सम्मत है।
ज्योतिषविद विमल जैन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के प्रोफेसर सुभाष पाण्डेय के अनुसार मकर संक्रांति का पुण्यकाल 14 जनवरी 2026 की रात्रि 09:39 बजे से शुरू होकर 15 जनवरी को दोपहर 01:39 बजे तक रहेगा। इस कारण 15 जनवरी को पूरे दिन पर्व मनाना शास्त्र सम्मत माना गया है। इस दिन वृद्धि योग, शुक्ल पक्ष द्वादशी तिथि और ज्येष्ठा नक्षत्र का संयोग भी रहेगा।
आखिर क्यों बदलती है तारीख..
काशी के ज्योतिषविद दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री के अनुसार हर वर्ष सूर्य के राशि परिवर्तन में लगभग 20 मिनट का विलंब होता है। इस प्रकार तीन वर्षों में यह अंतर एक घंटे का हो जाता है। 72 वर्षों में 24 घंटे का फर्क आ जाता है। यानि एक दिन की वृद्धि हो जाती है। इस लिहाज से वर्ष 2008 में ही 72 वर्ष पूरे हो गए थे। हालांकि छह वर्षों तक सूर्य का राशि परिवर्तन प्रातःकाल में होने से पूर्व काल मानते हुए मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनाई जाती रही। इससे पहले सूर्य का राशि परिवर्तन संध्याकाल में होता था। वर्ष 1936 से मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जा रही थी। वहीं 1864 से 1936 तक 13 जनवरी और 1792 से 1864 तक 12 जनवरी को मकर संक्रांति मनाई जाती थी।
ऐसे करे सूर्य आराधना
1 सुबह-सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्यक्रिया से निवृत्त होकर किसी पवित्र नदी सरोवर या तालाब या फिर पानी में गंगाजल और मिलाकर स्नान करें।
2- गणेश जी संग अपने आराध्य का ध्यान करें।
3- तांबे के लोटे में जल, लाल पुष्प, लाल रोली, गुड़, अक्षत और काला तिल मिलाकर उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दें।
4- अर्घ्य देते समय सूर्य मंत्र ॐ सूर्याय नमः, ॐ भास्कराय नमः या ॐ आदित्याय नमः का उच्चारण करें।
5- अर्घ्य देते समय जल की धारा में देखकर सूर्य देव का दर्शन करे।
6- 3 बार परिक्रमा करें। अपनी मनोरथ रखते हुए क्षमा याचना करें
जानिए क्या है परंपरा
इस दिन प्रातःकाल गंगा सहित किसी भी पवित्र नदियों में स्नान कर तिल, तिल का लड्डू, सरसों तेल, अन्न एवं वस्त्र का दान करने की धर्म शास्त्र में उल्लेख है । जबकि मकर संक्रांति पर खिचड़ी, दही-चूड़ा और तिल से बने व्यंजन ग्रहण करने की परंपरा चलन है।
इन नामों से भी जाना जाता है…
मकर संक्रांति को विभिन्न नाम से जाना जाता है, उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में यह उत्सव ‘खिचडी’ पर्व के नाम से जबकि पश्चिम बंगाल में इसे ‘पौष संक्रान्ति’ से। दक्षिण के तमिळनाडु में इसे ‘पोंगल’ कहा जाता है । कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं। जबकि बिहार के कुछ जिलों में यह पर्व ‘तिला संक्रांत’ नाम से भी प्रसिद्ध है। सिंधी समुदाय में इस पर्व को ‘तिरमौरी’ कहते हैं । यही त्यौहार गुजरात और उत्तराखंड में ‘उत्तरायण’ नाम से भी जाना जाता है । हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब में ‘माघी’। तो वही पूर्वी भारत में स्थित असम में ‘भोगाली बिहु’ के नाम से मनाया जाता है । कश्मीर घाटी में इसे ‘शिशुर सेंक्रात’ कहां जाता है । कर्नाटक में ‘मकर संक्रमण’ कहते है । पंजाब में यह उत्सव ‘लोहडी’ नाम से भी मनाया जाता है।
विश्वनाथ मंदिर 2.3 km, कालभैरव 4 km, संकटमोचन 1.2 km, अस्सी घाट .70 km
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