Home 2026 कब है संकष्टी गणेश चतुर्थी और माही-तिलकुटा चौथ ? जानें सही तिथि,पूजा विधि व लोक कथा

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कब है संकष्टी गणेश चतुर्थी और माही-तिलकुटा चौथ ? जानें सही तिथि,पूजा विधि व लोक कथा

– संदीप त्रिपाठी, काशी

सकट चौथ पर भगवान गणेश की पूजा में तिल और गुड़ का विशेष महत्व होता है, इसे ‘तिलकुट’ भी कहा जाता है। इस दिन गणेश जी की आराधना करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं।

माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को सकट चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। सकट चौथ का व्रत संतान की सुरक्षा और परिवार की सुख-शांति के लिए रखा जाता है। इस साल सकट चौथ का व्रत 6 जनवरी दिन मंगलवार को रखा जाएगा। इस दिन भगवान गणेश की पूजा की जाती है और उन्हें तिलकुट का भोग लगाया जाता है। संकट चतुर्थी को वक्रतुण्डी चतुर्थी, माही चौथ और तिलकुटा चौथ भी कहते हैं। सकट चौथ का व्रत माघ मास की चतुर्थी को संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है। यह भगवान गणेश को समर्पित है क्योंकि इसी दिन उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा संकट टाला था और माता-पिता की परिक्रमा कर अपनी बुद्धि का परिचय दिया था। गणेश जी को विघ्नहर्ता माना जाता है, और इस व्रत को रखने से वे प्रसन्न होकर संतान पर आने वाले सभी संकटों को दूर करते हैं।

सकट चतुर्थी व्रत मुहूर्त

माघ कृष्ण चतुर्थी तिथि प्रारंभ 6 जनवरी 2026 दिन मंगलवार की सुबह 8 बजकर 01 मिनट पर शुरू होगी।
माघ कृष्ण चतुर्थी तिथि का समापन 7 जनवरी 2026 दिन बुधवार की सुबह 6 बजकर 52 मिनट पर होगी।
सकट चौथ के दिन चंद्रोदय रात 8 बजकर 54 मिनट पर होगा।
चंद्रोदय तिथि के अनुसार सकट चौथ का व्रत 6 जनवरी 2026 दिन मंगलवार को रखा जाएगा।

भगवान गणेश को क्यों समर्पित है यह चतुर्थी ?

शास्त्रों के अनुसार, माघ मास की इसी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश ने अपने जीवन का सबसे बड़ा संकट टाला था और अपनी बुद्धि का लोहा मनवाया था। इसी दिन उन्होंने अपने माता-पिता (शिव-पार्वती) की परिक्रमा कर यह सिद्ध किया था कि माता-पिता के चरणों में ही समस्त ब्रह्मांड का वास है। भगवान गणेश ‘विघ्नहर्ता’ हैं, यानी दुखों को हरने वाले। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से गणेश जी प्रसन्न होते हैं और संतान पर आने वाले सभी संकटों (सकट) को दूर कर देते हैं, इसीलिए इसे ‘सकट चौथ’ कहा जाता है।

स्वयं गणेश जी पर आए संकट का अंत

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान गणेश के जीवन का एक बड़ा संकट दूर हुआ था। माता पार्वती ने उन्हें अपने उबटन से बनाया था और भगवान शिव के साथ उनके युद्ध के बाद उन्हें हाथी का सिर लगाकर नया जीवन मिला था। यह दिन उनके पुनर्जन्म और मंगलकारी रूप की स्थापना का उत्सव भी है।

संकट चौथ व्रत पूजा विधि

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें. हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
शाम के समय एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करें।
गणेश जी को पीले वस्त्र धारण करा कर, धूप, घी, लाल रोली, कलावा, फूल अर्पित करें।
गणेश जी को 21 दूर्वा की गांठें चढ़ाएं। दूर्वा गणेश जी को अत्यंत प्रिय है।
तिल और गुड़ से बना तिलकुट का भोग लगाएं और मोदक या फल भी चढ़ाएं।
घी का दीपक जलाकर गणेश जी की आरती करें।
सकट चौथ की व्रत कथा जरूर पढ़ें या सुनें. बिना कथा के पूजा अधूरी मानी जाती है।

चंद्रोदय और अर्घ्य के नियम

सकट चौथ का व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही संपन्न होता है। संकट चौथ के दिन चंद्रोदय रात 8 बजकर 54 मिनट पर होगा। भगवान श्रीगणेश के पूजन के बाद चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है, और चंद्र देव से घर-परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना की जाती है। रात में चंद्र उदय होने के बाद लोटे में जल, दूध, तिल और अक्षत मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। चंद्रमा को देखते हुए अपने परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, अर्घ्य देने के बाद ही तिलकुट का प्रसाद खाकर व्रत खोलें।



विश्वनाथ मंदिर  1 km, कालभैरव 2 km, संकटमोचन .75km, अस्सी घाट .50 km


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Author: Admin Editor MBC

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