Jitiya Vrat Kab Hai 2025 – नोट कर लें जीवित्पुत्रिका व्रत की तारीख, पूजा विधि एवं मुहूर्त, किसकी होती है पूजा और महत्व
– आश्विन कृष्ण अष्टमी पर किया जाता है जितिया व्रत।
– निर्जला रखा जाता है जीवित्पुत्रिका व्रत।
– संतान को मिलता है सुख-समृद्धि का आशीर्वाद।
बिहार झारखंड और उत्तर प्रदेश के कई स्थानों पर जितिया व्रत किया जाता है जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत के नाम से भी जाना जाता है। माना गया है कि इस व्रत को श्रद्धा पूर्वक करने से संतान को दीर्घायु स्वास्थ्य और सुख-सम्पन्नता की होती है।
किस देवता की होती है पूजा ?
जितिया व्रत के दिन भगवान जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, जीमूतवाहन एक गंधर्व राजकुमार थे। माना जाता है कि राजा जीमूतवाहन ने एक नागिन के पुत्र को बचाने के लिए खुद को गरुड़ के हवाले कर दिया था। इसी कारण उन्हें भगवान के रूप में पूजा जाने लगा और माताएं अपनी संतान की रक्षा के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत करने लगीं।
2025 में जितिया व्रत कब..
जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतानों की लंबी आयु और सुखी जीवन की कामना से पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं। ऐसी मान्यता है कि जो भी स्त्री ये व्रत श्रद्धापूर्वक करती है उसकी संतान दीर्घायु, निरोगी, तेजस्वी और सुख-सम्पन्न होती है। यह उपवास मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड और उत्तर प्रदेश की महिलाओं द्वारा किया जाता है। नेपाल में भी ये व्रत बेहद लोकप्रिय है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय ज्योतिष के प्रोफेसर डॉ सुभाष पाण्डेय और प्रो. विनय पाण्डेय ने बताया इस वर्ष जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत 14 सितंबर 2025, रविवार को रखा जाएगा। जीवित्पुत्रिका व्रत अष्टमी तिथि को मनाया जाता है जो 14 सितंबर की सुबह 05:04 से लेकर 15 सितंबर की सुबह 03:06 बजे तक रहेगी।
जितिया पूजा मुहूर्त 2025
ब्रह्म मुहूर्त 04:33 से 05:19 am
सन्ध्या 04:56 से 06:05 am
अभिजित मुहूर्त 11:52 से 12:41 pm
विजय मुहूर्त 02:20 से 03:09 pm
गोधूलि मुहूर्त 06:27 से 06:51pm
सायाह्न सन्ध्या 06:27 से 07:37 pm
ऐसे करें व्रत पूजन
इस दिन माताएं सुबह जल्दी उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
सूर्य देव को जल अर्पित करने के बाद जीमूतवाहन के समक्ष दीपक जलाकर पूजा करें और व्रत का संकल्प लें।
इसके बाद घर के मंदिर में धूप, दीप, आरती करें और इसके बाद भोग लगाएं।
फिर मिट्टी और गाय के गोबर से चील और सियारिन की मूर्ति तैयार करें।
फिर कुशा से बनी जीमूतवाहन की प्रतिमा को धूप, दीप, चावल, पुष्प आदि चढ़ाएं।
फिर विधि विधान पूजा करें और जितिया व्रत की कथा सुनें।
पूरे दिन व्रत करने के बाद अगले दिन सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद इस व्रत का पारण कें। इस दौरान चावल, मरुवा की रोटी, तोरई, रागी और नोनी का साग खाया जाता है।
जितिया व्रत का महत्व
यह व्रत विशेष रूप से महिलाओं द्वारा अपनी संतान की लंबी उम्र और उसकी मंगल कामना के लिए रखा जाता है। यह भी मान्यता है कि इस व्रत को करने से संतान के सभी दुख और तकलीफ दूर होते हैं। इस व्रत को लेकर यह मान्यता भी प्रचलित है कि, जो भी महिला जितिया व्रत कथा सुनती है, उसे जीवन में कभी भी संतान वियोग का सामना नहीं करना पड़ता।
जीवित्पुत्रिका व्रत की पौराणिक कथा
जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत की कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद अश्वथामा अपने पिता की मृत्यु की वजह से क्रोध में था। वह अपने पिता की मृत्यु का पांडवों से बदला लेना चाहता था। एक दिन उसने पांडवों के शिविर में घुस कर सोते हुए पांडवों के बच्चों को मार डाला। उसे लगा था कि ये पांडव हैं। लेकिन वो सब द्रौपदी के पांच बेटे थे। इस अपराध की वजह से अर्जुन ने उसे गिरफ्तार कर लिया और उसकी मणि छीन ली।
इससे आहत अश्वथामा ने उत्तरा के गर्भ में पल रही संतान को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया। लेकिन उत्तरा की संतान का जन्म लेना जरूरी था। जिस वजह से श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्य का फल उत्तरा की गर्भ में मरी संतान को दे दिया और वह जीवित हो गया। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से गर्भ में मरकर जीवित होने के वजह से इस बच्चे को जीवित्पुत्रिका नाम दिया गया। यही आगे चलकर राज परीक्षित बने। तभी से संतान की लंबी उम्र के लिए हर साल जिउतिया व्रत रखने की परंपरा को निभाया जाता है।
एक और कथा
उस कथा के अनुसार गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन ने नाग वंश की रक्षा के लिए स्वयं को पक्षीराज गरुड़ का भोजन बनने के लिए सहर्ष तैयार हो गए थे। उन्होंने अपने साहस और परोपकार से शंखचूड़ नामक नाग का जीवन बचाया था। उनके इस कार्य से पक्षीराज गरुड़ बहुत प्रसन्न हुए थे और नागों को अपना भोजन न बनाने का वचन दिया था। पक्षीराज गरुड़ ने जीमूतवाहन को भी जीवनदान दिया था। इस तरह से जीमूतवाहन ने नाग वंश की रक्षा की थी। इस घटना के बाद से ही हर वर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जितिया व्रत या जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जाने लगा।
विश्वनाथ मंदिर 1 km, कालभैरव 2 km, संकटमोचन .75km, अस्सी घाट .50 km
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