Pitru Paksha – पितृ पक्ष में क्या करें क्या न करें..? क्या है श्राद्ध के 12 प्रकार और
सनातन धर्म में धार्मिक व पौराणिक मान्यता के अनुसार मानव जीवन में देवी-देवताओं की पूजा के पूर्व पितरों की भी पूजा का विधान बताया गया है। पितृगणों को प्रसनता से ही जीवन खुशहाल बनता है। पितृपक्ष में पितृगणों की प्रसन्नता के लिए उनका श्राद्ध करने की धार्मिक व पौराणिक मान्यता है। सनातन धर्म में श्राद्ध की विशेष महिमा है। आश्विन कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तिथि तक पितृपक्ष कहलाता है। इस बार पितृपक्ष 7 सितम्बर, रविवार से प्रारम्भ होकर 21 सितम्बर, रविवार एक श्राद्ध सम्बन्धित समस्त कृत्य किए जाएंगे। पितरों के निमित्त प्रातः काल स्नान करके तिल, जौ, अक्षत, कुशा एवं गंगाजल सहित संकल्प लेकर पिण्डदान व तर्पण किया जाता है। सनातन धर्म में अपने परिवार के दिवंगत प्राणियों का श्रद्धा के साथ श्राद्ध किया जाता है। जिससे भौतिक सुख, समृद्धि, वैभव, यश, सफलता आदि प्राप्त होकर जीवन में सौभाग्य का मार्ग प्रशस्त होता है। पितृपक्ष में प्रत्येक व्यक्ति को अपने दिवंगत माता-पिता एवं अन्य परिजनों को मृत्यु तिथि पर श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य सगे-सम्बन्धियों का भी तिथि विशेष पर श्राद्ध करने का नियम है। जिनको अपने परिजनों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, उन्हें श्राद्ध पक्ष के अन्तिम दिन यानि अमावस्या तिथि/सर्व पितृ अमावस्या (पितृ विसर्जन) के दिन श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। जिन परिजन मृत्यु पूर्णिमा तिथि के दिन हुई हो, उनका भाद्रपद माह के पुर्णिमा तिथि के दिन करने का नियम है। पूर्णिमा तिथि का श्राद्ध प्रौष्ठपदी ब्राद्ध के नाम से जाना जाता है। इस बार यह श्राद्ध 7 सितम्बर, रविवार को किया जाएगा। श्राद्ध कृत्य योग्य विद्वान् कर्मकाण्डो पंडितजी, जो श्राद्ध कृत्य सम्पन्न करवाते हैं, उनसे ही पितृपक्ष सम्बन्धित सारे कार्य श्रद्धा सहित सम्पन करवाना चाहिए।
श्राद्ध 12 प्रकार
(1) नित्य, (2) नैमित्तिक (3) काम्प, (4) वृद्धि (5) सपिण्डन, (6) पार्वण, (7) पाचंग, (8) सुद्धयर्थ (9) कमांग (10) दैविक, (11) औपचारिक, (12) सांवत्सरिक श्राद्ध आदि।
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16 दिन यह कार्य करें
पितृपक्ष में सायंकाल अपने घर के मुख्यद्वार के बाहर दीप प्रज्वलित करके श्रद्धापूर्वक पितृविसर्जन करने का विधान है।
अमावस्या तिथि के दिन परिवार के सभी पितरों के श्राद्ध करने का विधान है।
श्राद्ध सम्बन्धित कृत्य मध्याहकाल में करना उत्तम रहता है।
सूर्यास्त के पश्चात् श्राद्ध सम्बन्धित कोई भी कृत्य नहीं करना चाहिए।
श्राद्ध में होने वाले मुख्यरूप से कार्य-पिंडदान, तर्पण एवं ब्राह्मण भोजन।
श्राद्ध में योग्य ब्राह्मणों को घर पर निमन्त्रित करके भोजन करवाया जाता है। ब्राह्मण को कराये गए भोजन से पितृगणों को प्रसन्नता होती है। 1, 3 या 5 बाह्मणों को भोजन करवाने की मान्यता है।
ब्राहाणों को भोजन करवाने के पश्चात् उनको अन्य वस्तुएँ जैसे-अन्न, वस्त्र, घी. गुड़, तिल, चाँदी तथा नमक आदि का दान किया जाता है। सामर्थ्यवान् गाय, भूमि, स्वर्ण एवं अन्य वस्तुएँ भी देते हैं।
ब्राह्मण को यथाशति दक्षिणा देकर उनको प्रसन्न करके उनकी विदाई करनी चाहिए। जिससे पितृगण प्रसत्र रहते हैं. इनसे हमें आशीवाद मिलता है।
ब्राह्मण भोजन करवाने के पूर्व गाय कुता कौआ चींटी व देवता के निमित्त पत्ते पर भोजन निकालना चाहिए जिसे पंचकर्म कहते हैं।
यदि समय पर ब्राहाण को भोजन न करा सकें तो ब्राह्मण को भोजन की सामग्री और नगद दक्षिणा देना चाहिए।
यदि यह भी कर सके तो पितरों को याद करके गाय को हरा चारा खिला देना चाहिए।
आर्थिक परेशानियां किसी विशेष अड़चन से यदि ऐसा भी नहीं कर सकते हैं तो दक्षिण की ओर मुख कर दोनों हाथ उठाकर पितरों को सुमिरन करते हुए उन्हें अपनी परेशानी बताये और अपनी श्रद्धा स्वीकार करने का निवेदन करना चाहिए। ध्यान रखें ऐसा आपात परिस्थिति में ही करना चाहिए।
न करें यह कार्य –
श्राद्धकृत्य में लोहे का बर्तन इस्तेमाल करना वर्जित है।
भोजन के अन्तर्गत अरहर, मसूर, कद्दू (गोल लौकी), बैंगर, गाजर, शलजम, सिपाड़ा, जामुन आलसी, चना आदि का प्रयोग नहीं किया जाता है।
श्राद्धवाले दिन सत्कृत्यों की और मनोवृत्ति होनी चाहिए। प्राचर्य नियम का पालन करना चाहिए।
सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए।
श्राद्धपक्ष में कोई भी नया कार्य प्रारम्भ नहीं करना चाहिए।
इस पक्ष में अपने परिवार के अतिरिक्त अन्यत्र भोजन आदि कुछ भी ग्रहण करना चाहिए।
भोजन में लहसुन प्याज का सेवन करना वर्जित है।
विश्वनाथ मंदिर 1 km, कालभैरव 2 km, संकटमोचन .75km, अस्सी घाट .50 km
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